Saturday, 27 December 2025

ईश्वर का जन्म विविध कलाओं के साथ होता है परन्तु पुरुष की उत्पत्ति पञ्च कलाओं के साथ होती है :-

🌹ईश्वर का जन्म विविध कलाओं के साथ होता है परन्तु पुरुष की उत्पत्ति पञ्च कलाओं के साथ होती है :-

१)आनन्द

२)विज्ञान

३)मन

४)प्राण

५)वाक्

शरीर अन्नमय कोष है और आत्मा आनंदमय कोष है | 

जब प्राण और अन्नमय कोष मिलता है तो चित्त की सात अवस्थाएं पैदा होती हैं | प्राणमय कोष के साथ शुक्र फिर क्रमशः मज्जा, अस्थि, मेदा, स्नायु, सांस, रक्त, रस, त्वचा और लोम रहते हैं।

वैदिक विज्ञान में अन्न से निकलने वाला जो रस है वह सोमरस (मेडिकल में अन्न पाचन के बाद ग्लूकोस बनने की प्रक्रिया) माना जाता है और यह शरीर को प्राणों से जोड़ता है | इसी अन्न से उत्पन्न सोमरस से मन पोषित होता है और चन्द्रमा का अंश होने के कारण दिव्य होता है। इस प्रकार इस मन का पोषण और आत्मा के साथ मन का जुड़ाव दोनों इसी पोषक अन्न से जुडा है |

गर्भ में आत्मा रूप जब स्थूल शरीर धारण की प्रक्रिया में होता है तब 28 दिन में स्त्री रज चन्द्रमा की 28 सोम कलाओं जैसे ही पिंड भाव में परिपक्व होता है | एक वर्ष में ३६० दिनों में इस प्रकार की १३ चंद्र्मासों में १३ पिंड भाव बनते हैं | और यही कारण है की मरणोपरांत पिंडदान में १३ मासिक पिंड दिए जाते हैं २ अर्धवार्षिक एवं एक वार्षिक पिंड दान दिया जाता है | इस प्रकार एक संवत्सर में कुल १६ पिंडदान दिए जाते हैं| मासिक पिण्ड के आने पर उससे पूर्व के पिण्ड क्षीण होते रहते हैं।

इस प्रकार पिंडदान से पितर का सूक्ष्म शरीर १६ पिंड भावों से सदैव सम्पन्न रहता है | शुक्राणु में इस पिण्डरस का पतन भाव रहता है। शुक्राणु का प्रभाव पत्य और अपत्य भाव में परिलक्षित होता है | शरीर के शोणितमय अग्नि में (मासिक धर्म में) आहुत होने वाला यह सोममय शुक्र अष्टम सन्तान तक, पुत्र भाव में, अपत्य कहा जाता है। पितरों को समर्पित पिंड हमारे पितरों को वर्ष भर 28 कलायुक्त सूक्ष्म शरीर को उर्जा देते रहते हैं | पितृपक्ष में वार्षिक पिंडदान के माध्यम से पितरों को पुन: प्राप्त हो जाने के कारण उनके पिण्ड पतन की क्षतिपूर्ति हो जाती है।

28 कलाओं युक्त पितरों के पिंड भाव हमारे शरीर में शुक्रभाव (पुरुष) या रजभाव(स्त्री) में सदैव उपस्थित भी रहते हैं | हमारे शाश्त्रों में कहा गया है “आत्मा वै जायते पुत्र:। अर्थात हमारा आत्म तत्व ही पुत्र रूप में जन्म लेता है | और हमारे आत्म तत्व के सूक्ष्म शरीर में हमारे पूर्वजों के पिंड भाव भी मौजूद रहते हैं |

चन्द्रमास का 28 कला का पिण्ड रूप तेज शोणितमय अग्नि (मासिक धर्म) में पहुंचकर पितृस्तोम यज्ञ के द्वारा सन्तान रूप में विस्तृत होता है। यह पितृ पिण्ड रूप ये आत्मा ही स्त्री के शोणित अग्नि में सोम का सेवन करता है। और पुरुष पक्ष में पितृ पिंड दो भागों में विभाजित होता है एक स्वयं पुरुष भाव में और दूसरा उसके शुक्र भाव में |

किसी व्यक्ति के स्वयं में समाये पितृ पिंड की 28 कलाओं में 7 कला (1/4) स्वयं में उपस्थित होती है | इन सात प्राणों के बाद शेष 21 भाग पुत्रों के होते हैं। इसमें जितना रस पुत्र शरीर में रहता है, पितृस्तोम यज्ञ के आवपन क्रम में उसके भी दो भाग हो जाते हैं। इसमें 21 कला के अपने पिण्डरस का 6 कला (3½ अंश) वाला भाग पिता का, शेष 15 कला उसके पुत्रों के अंश होते हैं। पौत्र शरीर पैदा करने को यह दूसरा आवाप है।आगे इन 15 कला रस के भी दो भाग हो जाते हैं। पिता के पांच अंश (तृतीय भाग), शेष दस कला पुत्रों की प्रपौत्र के शरीर निर्माण के लिए होती है। यह तीसरा आवपन है। अगले आवपन क्रम में दस कला वाले पिण्डरस के दो भाग हो जाते हैं। अढ़ाई (2½ अंश) रूप चार कला पिता में रहती है। शेष 6 कला उसके पुत्रों में जाती है। वे वृद्ध प्रपौत्र के शरीर का निर्माण करती हैं। यह चौथा आवपन है।

वृद्ध प्रपौत्र की छह कलांश के भी दो भाग हो जाते हैं। तीन कला (द्वितीयांश) रूप पिता होता है। शेष तीन कला अतिवृद्ध प्रपौत्र का निर्माण करती है। यह पांचवां आवपन होता है। अन्त में तीन कला पुत्रांश के भी दो भाग होते हैं। दो कला वाला पिता तथा एक कला पुत्र के लिए। यह अंश वृद्ध से भी अतिवृद्ध प्रपौत्र के शरीर का निर्माण करने में उपयोग होती है। यह छठा आवपन है। इसके आगे शेष एक कला के भाग नहीं होते। यह एक कला पितृभाग रूप ही निकल जाती है। आगे पुत्र भाग में कोई कलांश नहीं रहता। सप्तम आवपन पर पिण्ड का सन्तान भाव समाप्त हो जाता है।

इस प्रकार पुरूष की यह महान आत्मा 84 कलाओं से सम्पन्न होता है। इनमें 56 कला पितरों की होती है तथा 28 उसकी स्वयं की होती है। आधुनिक विज्ञान इसी 28 कलाओं को गुण सूत्र का नाम से दुनिया को समझती है |

 अत: इस प्रकार पितरों के अंश को प्राप्त करके जन्म ग्रहण करने वाला पुरूष सात जन्म के काल क्रम तक पितरों का ऋणी होता है। जैसा कि तैतरीय ब्राह्मण मे कहा गया है-

              “एष वै जायमानस्त्रभिर्ऋण्वान् 
               जायते ब्रह्मचय्र्येण ऋषिभ्यो,

                यज्ञेन देवेभ्य:, प्रजया पितृभ्य:। 
                एष वा अनृणी य: पुत्री यज्वा ब्रह्मचारी च।”
                                              (तैत्तरीय संहिता) |

इस तरह इस धरती पर जन्म लेने वाला हर जातक पितृऋण के साथ पैदा होता है |

यज्ञ से देवताओं का तथा प्रजा रूप सन्तान क्रम से पितरों के ऋण का प्रत्यर्पण होता है। जो पुत्रवान् हो, यज्ञ करने वाला हो तथा ब्रह्मचर्य पालन करता हुआ वेदों के अध्ययन में रत हो, वही अनृणी (उऋण) माना जाता है।

स्मृति में वर्णन है की पूर्व की सात पीढ़ियों में पिता-पितामह-प्रपितामह ये तीन पीढियां पितर पिंड की भागी होती हैं और आदि चार पूर्व पितर लेपमात्र के ग्राही होते हैं |

 प्रत्येक पुरूष में ये 84 कला नित्य विराजमान होती है जबकि 5 कलाएं प्रभावी रहती है। इन 84 कलाओं में से 28 स्वयं की उपार्जित ( विज्ञानं में गुणसूत्र) , 56 कला छह पितरों द्वारा प्रदत्त अग्रिम सर्जन क्रिया की होती है। उनमें पिता से 21 कला, पितामह से 15, प्रपितामह से 10, वृद्ध प्रपितामह से 6, अति वृद्ध पितामह से 3 और वृद्धातिवृद्ध पितामह से एक कला प्राप्त होती है। इनमें पिता, पितामह, प्रपितामह की जो 21,15,10 कला होती हैं, उनमें पदार्थो की अधिकता के कारण पिण्ड शब्द का प्रयोग होता है। आगे अल्पता के कारण लेप आता है।

उपरोक्त के समर्थन में विज्ञान भी कहता है की किसी संतान के जन्म में तीन पीढ़ी के माता-पिता पक्ष के कोई भी गुण प्रभावी होने के 90% सम्भावना होती है | बाकि 10 प्रतिशत उपर के 4 पीढ़ियों की हो सकती है |

इसी से 84 चन्द्र रसमयी यश नामक कला नित्य आत्मा में स्थित रहती है। इनको “उक्थ” कला कहते हैं। इनमें प्रथम छह धन भाग तो पितृ सम्बन्धी होते हैं। सातवां एक स्वयं का। ये ही सात ग्रह हैं। यही महान आत्मा का स्वरूप है। 

यह महान आत्मा 28 कला युक्त होता है। शेष 56 कला युक्त पुत्र (तन्य) होता है। वहां भी 21 कला रूप उसकी सम्पत्ति होती है। शेष 35 कला से पांच पितृ सम्बन्धी धन माने जाते हैं। ये सब सन्तान के लिए होते हैं। अत: सन्तान उत्पत्ति के द्वारा उनसे ऋण मुक्त होना चाहिए।

कुल देवी, कुल देवता और ग्राम देवी-देवता, दो शक्तियों की रहस्यमयी दुनिया, जिनके बिना अधूरी है हर पूजा (खरमास में पाए कुलदेवी, ग्राम देवता की कृपा)

कुल देवी, कुल देवता और ग्राम देवी-देवता, दो शक्तियों की रहस्यमयी दुनिया, जिनके बिना अधूरी है हर पूजा (खरमास में पाए कुलदेवी, ग्राम देवता की कृपा) 
आपके कुल की शक्ति कौन है? आपके गांव की रक्षा कौन करता है? जानिए कुलदेवी और ग्रामदेवी की पारंपरिक, धार्मिक, सामाजिक मान्यता और ज्योतिषीय महत्व। 
भारत के धार्मिक और सामाजिक जीवन में कुलदेवी-देवता और ग्राम देवी-देवता की अवधारणाएं सिर्फ पूजा के लिए नहीं, बल्कि पहचान, पूर्वज-स्मृति और सुरक्षा के लिए खड़ी की गई थीं। 
इनका आधार वेदों से शुरू होकर गांवों के जीवन में समाहित हो गया. यही वजह है आज भी इन नियमों का पालन पूरे अनुशासन के साथ किया जाता है।
कुलदेवी-देवता, वंश की आध्यात्मिक रीढ़ वैदिक और स्मृति ग्रंथों में मूल इसके बारे में विस्तार से बताया गया है। ये परंपरा कुछ वर्षों की नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से चली आ रही है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी ट्रांसफर होती चली आ रही है। आज के आधुनिक दौर में भी इनकी अनदेखी करने की हिम्मत किसी में नही है। 
इस परंपरा के निशान ऋग्वेद में कुल और गण के साथ देवताओं की संरचना में मिलती है। मनुस्मृति (3.203) में स्पष्ट बताया गया है कि कुलस्य रक्षणार्थं तु कुलदेवतां समाचरेत्। इसका अर्थ है कि वंश की रक्षा के लिए कुलदेवता की पूजा की जाए।
इसी प्रकार प्राचीन ग्रंथ जैसे याज्ञवल्क्य स्मृति और पाराशर स्मृति में कुलदेवता को पितरों के तुल्य पूजनीय माना गया है।

कुलदेवता कौन होता है?
एक विशेष गोत्र, वंश या जाति के लिए तय किया गया ईष्ट या रक्षक देवता। 
उनकी पहचान पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा, कुल पुरोहित, या पारिवारिक मंदिर से होती है।
कुलदेवता की पूजा कब और क्यों?
विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, उपनयन, साधना जैसे संस्कारों से पहले।
कई घरों में देवता की मूर्ति,चित्र को रखकर विधिपूर्वक पूजन किया जाता है।
ग्राम देवी या ग्राम देवता, गांव की सीमा पर बैठे रक्षक!
इसकी उत्पत्ति के बारे में आदिवासी संस्कृति, द्रविड़ परंपरा और पुराणों में व्यापक उपस्थिति देखने को मिलती है। स्कन्द पुराण में ग्रामपाल का उल्लेख मिलता है जो महामारी और बुरी शक्तियों से गांव की रक्षा करता है। 
ये पूजा क्यों जरूरी है?
गांव में वर्षा, फसल, महामारी, आग, अकाल से बचाव के लिए।
नवरात्रि, चैत्र मास, जत्रा और अमावस्या पर विशेष पूजा।
दोनों का धार्मिक अर्थ।।
कुलदेवता- पूर्वजों की आत्मा की सुरक्षा और मार्गदर्शक शक्ति। 
ग्रामदेवता- भौगोलिक, जैविक और सामाजिक संकटों के विरुद्ध रक्षक। 
इन दोनों को समझना अपने मूल, परंपरा और सामाजिक संरचना को समझना है
आज के दौर में ये क्यों आवश्यक है
आज के शहरों में रहते हुए भी लोग कुलदेवी के दर्शन के बिना विवाह नहीं करते। 
ग्रामदेवता के मंदिरों में अब भी मेला, बलिदान और परिक्रमा की परंपरा जीवित है। 
ये लोक-शक्ति और शास्त्र-शक्ति का अद्भुत संगम हैं।
कुलदेवी या कुलदेवता की पूजा न करने से कौन से ग्रह अशुभ होते हैं?
चंद्रमा- मानसिक अशांति, परिवार में कलह
मंगल- विवाह और संतान में बाधा
गुरु-धर्म से भटकाव, संस्कारों में विघ्न
शनि- पितृदोष, बार-बार विफलता, आर्थिक संकट। 
क्या प्रभाव होते हैं?
विवाह, संतान, नौकरी और घर में बार-बार रुकावट। 
अकारण भय, बुरे स्वप्न, पूजा में अरुचि,
परिवार में कलह और पीढ़ियों में रोग 
लेकिन यदि कोई अपनी कुलदेवी या देवता नहीं जानता, तो क्या करें?
बुजुर्गों से पूछें। 
अपने परिवार के सबसे वृद्ध सदस्य से पूछें, जैसे हमारे यहां किसकी पूजा होती थी विवाह से पहले?
परिवार के पुराने चित्र, मंदिर, पूजा सामग्री देखें
कई बार घर में रखे गए प्राचीन चित्र, मूर्ति, सिंदूर, फूल की शैली संकेत देते हैं। 
कुल पुरोहित या गोत्र-सम्बंधी ब्राह्मण से पूछें
यदि आपके गोत्र या वंश के कुलपुरोहित का नाम ज्ञात है, उनसे संपर्क करें। 
पूर्वजों की भूमि (मूल ग्राम) जाएं। 
वहां स्थित गांव का प्रमुख मंदिर और उसका देवी या देवता अक्सर आपका कुलदेवता हो सकता हैं। 
जब कुछ ज्ञात न हो यदि सभी स्रोतों से जानकारी न मिले, तो शास्त्र सलाह देता है-
यदि कुलदेवता अज्ञात हो, तो ईष्टदेव रूप में विष्णु, शिव या देवी दुर्गा की आराधना की जा सकती है।
हिंदू धर्म और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य देव अपने गुरु बृहस्पति की राशियों (धनु या मीन) में प्रवेश करते हैं, तो उस अवधि को खर मास या 'मलमास' कहा जाता है। यह स्थिति साल में दो बार आती है एक बार मध्य दिसंबर में और दूसरी बार मध्य मार्च के दौरान।

इस महीने में सूर्य का तेज कम माना जाता है और बृहस्पति (गुरु) का प्रभाव क्षीण हो जाता है। इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और नए व्यापार की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।
भले ही यह समय भौतिक कार्यों के लिए शुभ न हो, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से इसे अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है। 
इसे 'पुरुषोत्तम मास' के समान ही पवित्र मानकर ईश्वर की भक्ति में समय बिताने की सलाह दी जाती है।
खरमास में किया गया दान, जप, तप, व्रत, सेवा और भगवान का स्मरण अत्यंत फलदायी माना गया है। इस समय गाय, ब्राह्मण, गरीब और जरूरतमंदों की सेवा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। 
कई लोग इस मास में मांसाहार, नशा और नकारात्मक आदतों से दूरी बनाते हैं ताकि मन और आत्मा शुद्ध रह सके।
खरमास में सूर्य देव की उपासना, गायत्री मंत्र का जाप और भगवान विष्णु की पूजा विशेष फलदायी होती है। इस दौरान तिल, ऊनी वस्त्र और अन्न का दान करना संकटों से मुक्ति दिलाने वाला माना गया है।
खरमास हमें सिखाता है कि जीवन में केवल सांसारिक उत्सव ही नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन और भक्ति के लिए भी समय निकालना आवश्यक है। यह रुकने, धैर्य रखने और अपनी ऊर्जा को ईश्वर की ओर मोड़ने का समय है।

अतृप्त इच्छाएं(भूख

मनुष्य की इच्छाएं ही बंधन है बार बार जन्मों की । ये ऐसी भूख है जो कभी तृप्त नही होती। तन की भूख,मन की भूख, बुद्धि अहंकार की भूख सदैव अतृप्त रहती है अगर ईश्वरमय जीवन न हो तो कर्म और फल , कर्म और फल का चक्कर शुरू रहता है। 

   भूख ही इस संसार का नियम है , भूख के ही कारण , पाप अधर्म है ! कोई किसी को नष्ट्त कर रहा है तो कोई किसी को , जबकि भूख केवल इस असत्य माया में है ! आत्मा को भूख नहीं लगती , भूख , ( शरीर / पेट / मन ) को  ही लगती है ! क्या हम शरीर मन मस्तिष्क हैं ,या हम आत्मा हैं ? साधना ध्यान तपस्या में हम मन को ही वश में करके आगे बढ़ते हैं ! अगर समाधि लग गई , तो समझिए असत्य इंद्रियां शांत , शरीर मृत्यु पर हम पुनः इस संसार में नहीं आएंगे ! अगर भूखे  निपटे तो आना ही पड़ेगा !

नब्बे प्रतिशत जड़ मानव द्वारा भोग हो चुके हैं ! जड़ /चेतन नियम अनुसार  उन नब्बे प्रतिशत चेतन और उनके आने वाले असंख्य वंश , मौजूदा धरती पर उपलब्ध 10 प्रतिशत जड़ में ही जनम लेंगे , इसीलिए हर (पशु प्राणी मानव) की जानसख्या अत्याधिक है !

माया में मौजूद सारे प्रश्न सारे उत्तर असत्य हैं , जहां से प्रश्न अवतरित होते हैं , वह मन ही असत्य माया का एक असत्य पिंड मात्र  है ! जब प्रश्न समाप्त तब आगे की यात्रा स्वतंत्र हो जाती है ! मूल प्रश्न यह नहीं धर्मयुद्ध कब होगा ? कैसे होगा ? कौन बचेगा , कितने बचेंगे ? जो बचेंगे वो भी अमर थोड़े हो जाएंगे , शरीर तो भगवान का भी अमर नहीं इस धरती पर ! मूल प्रश्न यह है , इस यात्रा में जाना कहां है ! इस धरती पर युद्दद्ध कभी समाप्त नहीं हो सकते ! जब तक भूख है तब तक युद्दद्ध है ! युद्दद्ध और शांत्ति एक दूसरे के विपरीत है ! इस माया से भूख कभी खतम नहीं किया जा सकता ! भूख पर नियन्त्रण ही परमानंद तक पहुंचाएगा ! वहां न भूख होंगी ना ही युद्ध , कुछ होगा तो वो होगा सदचितआनन्द !

   भागवत गीता द्वारा भगवान श्री कृष्ण ने जीव को मुक्ति के सरल मार्ग दिखाते है।

  भगवद गीता की अठारह बातों को अपनाकर अपने जीवन में उतारता है वह सभी दुखों से, वासनाओं से, क्रोध से, ईर्ष्या से, लोभ से, मोह से, लालच आदि के बंधनों से मुक्त हो जाता है। आगे जानते हैं भगवद गीता की 18 ज्ञान की बातें।

1. आनंद मनुष्य के भीतर ही निवास करता है। परंतु मनुष्य उसे स्त्री में, घर में और बाहरी सुखों में खोज रहा है।

2. श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवान उपासना केवल शरीर से ही नहीं बल्कि मन से करनी चाहिए। भगवान का वंदन उन्हें प्रेम-बंधन में बांधता है।

3. मनुष्य की वासना ही उसके पुनर्जन्म का कारण होती है।

4. इंद्रियों के अधीन होने से मनुष्य के जीवन में विकार और परेशानियां आती है।

5. संयम यानि धैर्य, सदाचार, स्नेह और सेवा जैसे गुण सत्संग के बिना नहीं आते हैं।

6. श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को वस्त्र बदलने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता हृदय परिवर्तन की है।

7. जवानी में जिसने ज्यादा पाप किए हैं उसे बुढ़ापे में नींद नहीं आती।

8. भगवान ने जिसे संपत्ति दी है उसे गाय अवश्य रखनी चाहिए।

9. जुआ, मदिरापान, परस्त्रीगमन (अनैतिक संबंध), हिंसा, असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता इन सब में कलियुग का वास है।

10. अधिकारी शिष्य को सद्गुरु (अच्छा गुरु) अवश्य मिलता है।

11. श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन को बार-बार समझाना चाहिए कि ईश्वर के सिवाय उसका कोई नहीं है। साथ ही यह विचार करना चाहिए कि उसका कोई नहीं है। साथ ही वह किसी का नहीं है।

12. भोग में क्षणिक (क्षण भर के लिए) सुख है। साथ ही त्याग में स्थायी आनंद है।

13. श्रीकृष्ण कहते हैं कि सत्संग ईश्वर की कृपा से मिलता है। परंतु कुसंगति में पड़ना मनुष्य के अपने ही हाथों में है।

14. लोभ और ममता (किसी से अधिक लगाव) पाप के माता-पिता हैं। साथ ही लोभ पाप का बाप है।

15. श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्त्री का धर्म है कि रोज तुलसी और पार्वती का पूजन करें।

16. मनुष्य को अपने मन और बुद्धि पर विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये बार-बार मनुष्य को दगा देते हैं। खुद को निर्दोष मानना बहुत बड़ा दोष है।

17. यदि पति-पत्नी को पवित्र जीवन बिताएं तो भगवान पुत्र के रूप में उनके घर आने की इच्छा रखते हैं।

18. भगवान इन सभी कसौटियों पर कसकर, जांच-परखकर ही मनुष्य को अपनाते हैं।

    अपने इष्टदेवमे ओतप्रोत होकर उनके मय बन जाना मार्ग है इन आवागमन से बचने का।

  भगवान श्रीकृष्ण की आप सभी धर्मप्रेमी जनो पर सदैव कृपा हो यही प्रार्थना सह.. श्री मात्रेय नमः

Thursday, 25 December 2025

अनंत शून्य का वैभव

कल्पना कीजिए, एक ऐसी अवस्था जहां कुछ भी नहीं था—न आकाश, न धरती, न सूर्य, न तारे। समय भी नहीं था, इसलिए 'पहले' और 'बाद' का कोई अर्थ नहीं था। सिर्फ़ था तो एक अनंत शून्य, जो न प्रकाश था, न अंधकार, न शांति, न अशांति—बस एक निर्वात, जिसमें कुछ भी व्यक्त नहीं हुआ था।

 यह महाशून्य कोई साधारण शून्य नहीं था," वृद्ध आचार्य विश्वनाथ अपने शिष्यों को समझाते हुए कहते हैं। "यह वह स्थिति थी, जहां सब कुछ था, पर किसी भी रूप में नहीं था। यह निरंजन का निवास था—वह जो निर्लेप है, निर्मल है, जो किसी सीमा में नहीं बंधता।"

निरंजन वहाँ थे, पर किसी रूप में नहीं। वे केवल अस्तित्व मात्र थे—निराकार, निर्गुण, असीम। उनके होने और न होने में कोई भेद नहीं था। यह वह अवस्था थी जो चेतना के सभी स्तरों से परे थी, जहां विरोधाभास भी एकाकार हो जाते हैं।

"बाबा, यह कैसे हो सकता है?" एक छोटा शिष्य, रघु, जिज्ञासा से पूछता है। "कुछ है, तो उसका रूप तो होगा ही?"

आचार्य मुस्कुराते हैं, "बेटा, जब तुम सपने में कोई दुनिया देखते हो, तो वह कहां से आती है? वह तुम्हारे भीतर होती है, पर सपने के पहले वह कहीं नहीं होती। वैसे ही, निरंजन का अस्तित्व सब कुछ था, पर किसी रूप में व्यक्त नहीं था।"

निरंजन का जागरण

फिर एक क्षण आया—हालांकि 'क्षण' शब्द भी सही नहीं, क्योंकि तब समय था ही नहीं—जब निरंजन में एक हलचल हुई। एक अनदेखा स्पंदन, एक अनकही हलचल, जिसे हम 'जागरण' कह सकते हैं।

"क्या निरंजन भी अकेलेपन से ऊब गए थे?" छोटी राधा उत्सुकता से पूछती है।

आचार्य हंसते हैं, "राधा, अकेलापन और ऊब तो मनुष्य के गुण हैं। निरंजन तो पूर्ण हैं, उन्हें कुछ भी पाने की आवश्यकता नहीं। पर हां, उनमें स्वयं को जानने, स्वयं को अनुभव करने की एक इच्छा जगी।"

यह पहला संकल्प था—'मैं एक हूं, अनेक हो जाऊं'—और यहीं से सृष्टि का आरंभ हुआ।

सृष्टि का प्रथम स्पंदन

निरंजन ने सोचा, "मैं कौन हूं?" और इसी प्रश्न ने एक हलचल उत्पन्न कर दी। पूरे महाशून्य में एक कंपन दौड़ गया—एक ऊर्जा जो अब व्यक्त होना चाहती थी।

यही ऊर्जा 'आदिशक्ति' कहलाती है। यह निरंजन का ही स्वरूप थी, पर अब अभिव्यक्ति के एक नए रूप में थी। जैसे बीज में पूरा वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इस आदिशक्ति में संपूर्ण ब्रह्मांड का बीज था।

फिर एक विस्फोट हुआ—एक ऐसा प्रकाश, जिसने शून्य को भर दिया। विज्ञान इसे 'बिग बैंग' कहता है, पर संत इसे कहते हैं—सृष्टि का जन्म। अनगिनत कण चारों ओर फैल गए, जो आगे चलकर तारों, ग्रहों, आकाशगंगाओं का निर्माण करने वाले थे।

"लेकिन बाबा," चंदन पूछता है, "अगर निरंजन पूर्ण थे, तो यह सृष्टि क्यों बनाई?"

"क्योंकि यह आनंद का खेल था," आचार्य समझाते हैं। "जैसे बच्चे खेलते हैं बिना किसी कारण के, वैसे ही यह सृष्टि निरंजन की लीला है।"

लीला का प्रारंभ

अब जो पहले एक थे, वे अनेक रूपों में विभक्त होने लगे। निरंजन ने सबसे पहले पांच महातत्वों की रचना की—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। इनसे सारा भौतिक जगत बना।

"पर बाबा," राधा फिर पूछती है, "इसका हमसे क्या संबंध?"

"राधा," आचार्य कोमलता से कहते हैं, "वही निरंजन तुम्हारे भीतर भी हैं। तुम्हारी सांसों में, तुम्हारे विचारों में, तुम्हारी आत्मा में। वे कहीं बाहर नहीं, तुम्हारे अंदर ही हैं।"

आत्मा का आगमन

भौतिक जगत तैयार होने के बाद, निरंजन ने अपने ही एक अंश को आत्मा का रूप देकर, इसे शरीरों में प्रविष्ट कराया। आत्मा ही वह चैतन्य थी, जिससे जड़ पदार्थ में जीवन का संचार हुआ।

"अब मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूं," आचार्य धीरे से कहते हैं, "हर आत्मा का एक ही उद्देश्य है—अपने मूल स्रोत, निरंजन को पहचानना और उसमें विलीन हो जाना।"

देवों की उत्पत्ति

निरंजन ने ब्रह्मांड के संतुलन के लिए देवताओं की रचना की। ब्रह्मा, विष्णु और महेश को क्रमशः सृष्टि, पालन और संहार का कार्य सौंपा गया।

Saturday, 20 December 2025

एक बहुत ही सुंदर दृष्टांत...

एक बहुत ही सुंदर दृष्टांत...

एक बार की बात है वीणा बजाते हुए नारद मुनि भगवान श्रीराम के द्वार पर पहुँचे।

नारायण नारायण !!

नारदजी ने देखा कि द्वार पर हनुमान जी पहरा दे रहे है।

हनुमान जी ने पूछा: नारद मुनि ! कहाँ जा रहे हो?

नारदजी बोले: मैं प्रभु से मिलने आया हूँ। नारदजी ने हनुमानजी से पूछा प्रभु इस समय क्या कर रहे है?

हनुमानजी बोले: पता नहीं पर कुछ बही खाते का काम कर रहे है, प्रभु बही खाते में कुछ लिख रहे है।

नारदजी: अच्छा?? क्या लिखा पढ़ी कर रहे है?

हनुमानजी बोले: मुझे पता नहीं मुनिवर आप खुद ही देख आना।

नारद मुनि गए प्रभु के पास और देखा कि प्रभु कुछ लिख रहे है।

नारद जी बोले: प्रभु आप बही खाते का काम कर रहे है? ये काम तो किसी मुनीम को दे दीजिए।

प्रभु बोले: नहीं नारद, मेरा काम मुझे ही करना पड़ता है। ये काम मैं किसी और को नही सौंप सकता।

नारद जी: अच्छा प्रभु ऐसा क्या काम है? ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिख रहे हो?

प्रभु बोले: तुम क्या करोगे देखकर, जाने दो।

नारद जी बोले: नही प्रभु बताईये ऐसा आप इस बही खाते में क्या लिखते हैं?

प्रभु बोले: नारद इस बही खाते में उन भक्तों के नाम है जो मुझे हर पल भजते हैं। मैं उनकी नित्य हाजिरी लगाता हूँ।

नारद जी: अच्छा प्रभु जरा बताईये तो मेरा नाम कहाँ पर है? नारदमुनि ने बही खाते को खोल कर देखा तो उनका नाम सबसे ऊपर था। नारद जी को गर्व हो गया कि देखो मुझे मेरे प्रभु सबसे ज्यादा भक्त मानते है। पर नारद जी ने देखा कि हनुमान जी का नाम उस बही खाते में कहीं नही है? नारद जी सोचने लगे कि हनुमान जी तो प्रभु श्रीराम जी के खास भक्त है फिर उनका नाम, इस बही खाते में क्यों नही है? क्या प्रभु उनको भूल गए है?

नारद मुनि आये हनुमान जी के पास बोले: हनुमान ! प्रभु के बही खाते में उन सब भक्तों के नाम हैं जो नित्य प्रभु को भजते हैं पर आप का नाम उस में कहीं नहीं है?

हनुमानजी ने कहा कि: मुनिवर,! होगा, आप ने शायद ठीक से नहीं देखा होगा?

नारदजी बोले: नहीं नहीं मैंने ध्यान से देखा पर आप का नाम कहीं नही था।

हनुमानजी ने कहा: अच्छा कोई बात नहीं। शायद प्रभु ने मुझे इस लायक नही समझा होगा जो मेरा नाम उस बही खाते में लिखा जाये। पर नारद जी प्रभु एक अन्य दैनंदिनी भी रखते है उसमें भी वे नित्य कुछ लिखते हैं।

नारदजी बोले:अच्छा?

हनुमानजी ने कहा: हाँ!

नारदमुनि फिर गये प्रभु श्रीराम के पास और बोले प्रभु ! सुना है कि आप अपनी अलग से दैनंदिनी भी रखते है! उसमें आप क्या लिखते हैं?

प्रभु श्रीराम बोले: हाँ! पर वो तुम्हारे काम की नहीं है।

नारदजी: ''प्रभु ! बताईये ना, मैं देखना चाहता हूँ कि आप उसमें क्या लिखते हैं?

प्रभु मुस्कुराये और बोले मुनिवर मैं इनमें उन भक्तों के नाम लिखता हूँ जिन को मैं नित्य भजता हूँ।

नारदजी ने डायरी खोल कर देखा तो उसमें सबसे ऊपर हनुमान जी का नाम था। ये देख कर नारदजी का अभिमान टूट गया।

कहने का तात्पर्य यह है कि जो भगवान को सिर्फ जीव्हा से भजते है उनको प्रभु अपना भक्त मानते हैं और जो ह्रदय से भजते है उन भक्तों के वे स्वयं भक्त हो जाते हैं। ऐसे भक्तों को प्रभु अपनी हृदय रूपी विशेष सूची में रखते हैं।

🚩जय सियाराम🚩

Friday, 19 December 2025

ब्राह्मण होना गर्व नहीं — तप है।

“ब्राह्मण – जाति नहीं , जिम्मेदारी है...!!"

“जिस समाज में ब्राह्मण अपनी भूमिका भूल जाए, वहाँ धर्म गूंगा हो जाता है, न्याय अंधा और शक्ति पागल!”

ब्राह्मण कौन है...??

क्या वह जो सिर्फ यज्ञ करता है?
या वह जो जनेऊ पहन कर बैठा है?
नहीं!
ब्राह्मण वह है — जो समाज की आत्मा में ज्ञान की मशाल जलाता है।
वह जो अपने भीतर के अंधकार को पहले जलाता है,
ताकि पूरी दुनिया रोशनी देख सके।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्, बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः, पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥
                              (ऋग्वेद – पुरुषसूक्त)

वेद कहता है – ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ।
मुख — जो बोलता है, जो मार्ग दिखाता है।
ब्राह्मण समाज का दृष्टा है, चिंतक है, मार्गदर्शक है।

लेकिन आज ब्राह्मण को खुद नहीं पता कि उसका अर्थ क्या है!
ब्राह्मण कुर्सियों की राजनीति में खो गया,
डिग्रियों में उलझ गया,
और आत्मज्ञान की साधना भूल बैठा।

“न द्विजः कर्मणा ब्राह्मणः – ज्ञानत एव ब्राह्मणः।”
                                                  (मनुस्मृति)

ब्राह्मण जन्म से नहीं , कर्म और ज्ञान से होता है।
वह जो लोभ को जीत चुका हो,
वह जो सत्य को जीवन बना चुका हो,
वही सच्चा ब्राह्मण है।

ब्राह्मण वह है —
जो राजा को धर्म सिखाता है,
सेना को विवेक सिखाता है,
जनता को संयम सिखाता है,
और स्वयं को मौन में साधता है।

“शमः दमः तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥”
                               (भगवद्गीता 18.42)

गीता कहती है — ब्राह्मण के गुण हैं:
शांति, इन्द्रियों का संयम, तपस्या, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और श्रद्धा।

यह कोई विशेषाधिकार नहीं — यह दायित्व है।
ब्राह्मण का कर्तव्य है —
जहाँ असत्य हो, वहाँ शब्द बने।
जहाँ अंधकार हो, वहाँ दीप बने।
जहाँ अधर्म हो, वहाँ ज्वाला बने।

“न ब्राह्मणोऽभ्यसूयेत् — ब्राह्मणो हि देवता: पृथिव्याः।”
                                       (शतपथ ब्राह्मण 1.1.2.6)

ब्राह्मण को तुच्छ मत समझो — वह समाज की आत्मा है यदि निर्मल है तो...

तो हे मन कर्म वचन से ब्राह्मण!
जागो — अपने असली स्वरूप को पहचानो।
जागो — केवल ग्रंथ मत पढ़ो, जीवन को वेद बनाओ।
तुम्हारा मौन तप है,
तुम्हारा वाणी वेद है,
और तुम्हारा आचरण ही आदर्श है।

ब्राह्मण होना गर्व नहीं — तप है।
और इस तप का परिणाम है – जगत का कल्याण....

Wednesday, 10 December 2025

शास्त्रों पर शोध परक विचार,

 अब तो शास्त्र ही कम लोग पढ़ते हैं और यदि पढ़ते भी हैं तो किसी पूर्व स्थापित मत पर ही स्थिर रहते हैं। शोध परक विचारों की संख्या अत्यन्त न्यून हैं। 


शास्त्रों पर शोध परक विचार, अनुसन्धान आदि प्रारम्भ से ही होते आये हैं, इन्हीं के कारण आज बहुत सी स्थापित मान्यताएँ स्थिर हुई हैं।


षड्दर्शन आदि तो प्रसिद्ध ही हैं, मध्य कालीन भारत के महान दार्शनिकों ने तब के प्रचलित सिद्धांतों को स्वीकार करते हुए, उनके आधार पर शास्त्रों में सामंजस्य स्थापित करते हुए एक मत की स्थापना की और परवर्ती युग में जैसे ही उन्हें यह प्रतीत हुआ कि इसमें परिष्कार की आवश्यकता है, वैसे ही उनमें परिष्कार करते हुए अन्य परिष्कृत सिद्धांतों के प्रतिपादन में भी संकोच नहीं किया।


इसी क्रम में न्याय शास्त्र में एक मनोरंजक प्रश्नोत्तर प्राप्त होता है जिसमें तब के प्रचलित मत के अनुसार एक अस्पष्ट समाधान निकाल लिया गया था और कालान्तर में इनमें ही परिष्कार करते हुए परिष्कृत समाधान भी निकला।


न्याय कन्दली के अनुसार प्रश्नोत्तर इस प्रकार है :---

यद् गच्छति तत् सन्निहितव्यवहितार्थौ क्रमेण प्राप्नोति।

तत्कथं शाखा चन्द्रमसोस्तुल्यकालोपलब्धिः।


अर्थात् यदि आँखों से किरणें निकलकर बाह्य वस्तु के साथ संयुक्त होकर चाक्षुष प्रत्यक्ष को सिद्ध करती हैं, तो वृक्ष की शाखा तथा चन्द्रमा इन दोनों की युगपत् अथवा एक साथ उपलब्धि किस प्रकार सम्भव होती है। क्योंकि आँखों की किरणों का शाखा की अपेक्षा चन्द्रमा तक जाने में कुछ अधिक समय अवश्य लगेगा। ऐसी दशा में शाखा दर्शन से कुछ समय पश्चात् चन्द्रमा दिखाई पड़ना चाहिये। फिर भी वह शाखा दर्शन के साथ ही किस प्रकार दिखाई पड़ता है।


इसका समाधान न्याय कन्दली ने यह दिया गया कि :--

इन्द्रियवृत्तेराशुसञ्चारित्वात् पलाशशतव्यतिभेदवत् क्रमाग्रहणनिमित्तोऽयं भ्रमो, न तु वास्तवं यौगपद्यम्।


अर्थात् वास्तव में तो शाखा के पश्चात् ही चन्द्रमा दिखाई पड़ता है। पर यह कार्य इतनी तीव्रता से होता है कि हमें क्रमिकता का बोध न होकर युगपत् अर्थात् एक साथ प्रतीति होती है। जिस प्रकार यदि सौ कमल के पत्तों में सुई से छेद किया जाय तो स्पष्टतः गणित के तर्क के अनुसार एक के पश्चात् अन्य में क्रम से ही छेद बनेगा। पर तीव्रता के कारण हमें ऐसा लगता है कि सभी पत्तों में एक साथ छेद हो गया है। इसी प्रकार यहाँ भी शाखा-चन्द्र दर्शन क्रमिक होकर भी युगपत् प्रतीत होता है।


न्याय शास्त्र में तीव्रता को प्रकट करने के लिये यह ‘कमल के पत्ते का दृष्टान्त’ इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसने बाद में न्याय का रूप ही ले लिया। तत्त्व चिन्तामणि, प्रत्यक्षखण्ड पर मथुरानाथ टीका में इसे 'शतपत्र-भेद न्याय’ बताते हुये निरूपित किया है।


उपर्युपरिस्थितशतसंख्यकपत्राणां सूच्या युगपद् भेद-भ्रमविषयाणामपि वस्तुत: एकभेदानन्तरमपरमेदः।

--- तत्त्वचिन्तामणि पर मथुरानाथ टीका।

Tuesday, 9 December 2025

प्रेम' में किए गए समर्पण को सँभालना

मन की एक अत्यंत सूक्ष्म गिरह है - 'किसी का समर्पण' यह वह गिरह नहीं है जो दर्द से कसती है, बल्कि वह जो ज़िम्मेदारी की गरमाहट से धीरे-धीरे और मजबूत हो जाती है।


जब कोई व्यक्ति अपने मन का सबसे उजला हिस्सा, सबसे कोमल स्पंदन, और अपने भीतर की पूर्ण निष्ठा

आपके हाथों में रख देता है तो वह प्रेम नहीं, एक प्रकार का आत्म-निवेदन होता है।


ऐसे में किसी के समर्पण को हल्के में लेना केवल उस व्यक्ति के प्रति अन्याय नहीं है बल्कि स्वयं की संवेदनशीलता पर भी प्रश्नचिह्न की तरह है।


समर्पण न माँगा जा सकता है, न खरीदा जा सकता है...यह तो बस मिल जाता है, उन पलों में जब कोई हृदय

हम पर विश्वास करने का निर्णय ले लेता है।


और तब मन को बहुत सतर्क होना पड़ता है, क्योंकि प्रेम में सबसे बड़ी गिरह तब पड़ती है जब किसी ने हमपर बहुत भरोसा करके हमारा हाथ थामा हो और हम उसके प्रतिदान में अनिश्चितता दे बैठें।


यदि कोई तुम्हारे प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है तो यह केवल सौभाग्य नहीं है, यह #एक_मौन_उत्तरदायित्व भी है।

इतना प्रयत्न जरूर करना कि उसके विश्वास में कभी दरार न आए और उसके समर्पण को कभी पछतावे का रंग न छू पाए।


क्योंकि किसी की निष्ठा की रक्षा करना सबसे सुंदर,

सबसे कोमल, और सबसे दुर्लभ मनुष्यता है। इस मनुष्यता को बचाए रखना तुम्हारा - मेरा - हम सबका उत्तरदायित्व है।

Monday, 8 December 2025

पूरा ब्रह्मांड एक ही मूल चेतना से बना है

 पूरा ब्रह्मांड एक ही मूल चेतना से बना है — वही चेतना जो हर जीव, हर पेड़, हर तारे और हर परमाणु में अलग-अलग रूप में प्रकट होती है। यह चेतना कोई वस्तु नहीं, बल्कि वह ऊर्जा का अनुभव है जो सबको जोड़ती है। जिस तरह एक ही सागर से असंख्य लहरें उठती हैं और फिर उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी तरह हर जीव, चाहे वह इंसान हो या एक कण, उसी एक ब्रह्मांडीय चेतना की लहर है।


विज्ञान और अध्यात्म दोनों इस सत्य की झलक देते हैं। क्वांटम स्तर पर देखा जाए तो हर कण एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, मानो वे किसी अदृश्य जाल का हिस्सा हों। वहीं ध्यान और आत्मचेतना के अनुभव में भी व्यक्ति यह महसूस करता है कि “मैं” और “दूसरे” के बीच की सीमाएँ केवल भ्रम हैं — वास्तविकता में सब कुछ एक ही कंपन, एक ही ऊर्जा की अभिव्यक्ति है।


यह समझ हमारे भीतर गहरी करुणा और संतुलन जगाती है। जब हम जान लेते हैं कि हर जीव में वही चेतना प्रवाहित है जो हमारे भीतर है, तो द्वेष मिटने लगता है और एकता का अनुभव जन्म लेता है। यही वह बिंदु है जहाँ विज्ञान, अध्यात्म और प्रेम — तीनों एक हो जाते हैं।

Sunday, 7 December 2025

सभी को प्रसन्न रखना संभव है

 ये एक कड़वा सत्य है कि आप न तो सभी को प्रसन्न रख सकते हैं और न ही सभी के दुःखों को समाप्त कर सकते हैं। लोग अपनी-अपनी यात्राओं, अपनी तकलीफ़ों और अपनी परिस्थितियों के साथ जीते हैं और आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, हर किसी की राह आपके हाथों से नहीं बदल सकती। सबसे कठिन बात यही होती है कि जो सबसे अधिक मदद करना चाहता है, वही अक्सर सबसे अधिक थक जाता है। ऐसे लोग अपने भीतर एक गहरी करुणा लेकर चलते हैं। वे हर दर्द को महसूस करते हैं, हर पुकार को सुनते हैं, और हर तकलीफ में खुद को भी थोड़ा टूटता हुआ पाते हैं। पर सच यही है कि यदि आप खुद मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से स्थिर नहीं हैं, तो आपका कोई भी सुझाव, कोई भी सहानुभूति, कोई भी प्रयास स्थायी नहीं होगा। खाली बर्तन किसी को पानी नहीं दे सकता और खाली मन, थका हुआ शरीर या अस्थिर जीवन किसी की पीड़ा को सँभाल नहीं सकता। दूसरी ओर इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिनके पास शक्ति है, संसाधन हैं, सामर्थ्य है और सक्षम होने की हर कसौटी पर वे पूरे उतरते हैं। लेकिन उनमें से कई अपने ही दायरों, अपने अहंकार, अपनी महत्वाकांक्षाओं में इतने उलझे रहते हैं कि उन्हें दूसरों के दर्द दिखाई ही नहीं देते। उन्हें लगता है समय हमेशा उनके लिए रुककर खड़ा रहेगा, जैसे ज़िंदगी ने उन्हें कोई विशेष छूट दे रखी हो। वे मदद इसलिए नहीं करते कि वे नहीं कर सकते, वे इसलिए नहीं करते कि उन्हें इसकी आवश्यकता महसूस ही नहीं होती। और यही असमानता इस दुनिया का सबसे बड़ा विरोधाभास है: जो मदद करना चाहता है वो सक्षम नहीं; और जो सक्षम है वो अपने ही बनाए हुए सिंहासन में व्यस्त है। लेकिन इस पूरी जटिलता में एक सबसे महत्वपूर्ण सीख छुपी है। आपका पहला कर्तव्य स्वयं के प्रति है। खुद को संभालें, खुद को स्थिर रखें और अपनी ऊर्जा उसी जगह प्रयोग करें जहाँ वास्तव में उसका असर पड़ता हो। दुनिया का हर बोझ आपके कंधों पर नहीं है, और हर दुःख आपकी जिम्मेदारी भी नहीं है। आप इंसान हैं कोई चमत्कारी देवता नहीं। कभी-कभी दूरी रखना भी मदद का ही एक रूप होता है, क्योंकि जब आप खुद को सुरक्षित रखते हैं, तभी आप किसी का हाथ पकड़ने की क्षमता बनाए रखते हैं। लोग आपको हमेशा अपने अनुसार ढालना चाहेंगे। कोई चाहेगा आप हमेशा उपलब्ध रहें। कोई चाहेगा आप हमेशा धैर्य रखे रहें....!!!!!

सकारात्मक शब्द

 एक बार एक राजा ने सपने मे देखा कि उसके सारे दांत गिर गए है। राजा ने एक ज्योतिष को बुलाकर इस सपने का प्रभाव पूछा " ज्योतिषी बोला " महाराज सारे दांत गिर जाने का अर्थ है आपके सामने आपके सारे संबंधी मर जायेगें। और आप अकेले रह जायेगें।" ये सुनकर राजा को उस ज्योतिष पर गुस्सा आया। और ज्योतिष को जेल के डाल दिया। फिर दूसरे ज्योतिष को को बुलाकर उससे सपने का संकेत पूछा " दूसरा ज्योतिष बोला " महाराज सपना शुभ संकेत दे रहा है। आपकी आयु बहुत लम्बी होगी। और आप सौ साल जियेंगे। राजा बहुत खुश हुआ। और ज्योतिष को बहुत सारा धन इनाम मे दिया। दोनों ज्योतिष ने एक जैसा ही प्रभाव बताया था मगर दूसरे ज्योतिष के शब्द सकारात्मक थे। 

कहानी का मोरल :- यहाँ हर कोई अपने फायदे की खबर सुनना चाहता है। चाहे वह झूठे ही क्यों न हो। इसलिए नेगेटिव बात या तो बताएं ही नही अगर बतानी जरूरी है तो पोजेटिव तरीके से बताएं। वरना सामने वाला बेवजह आपका दुश्मन बन जायेगा।

सत्य परेशान कर सकता है, पर असत्य गुलाम बना देता है।

 कभी-कभी इंसान सत्य को जानता है, समझता भी है, पर उसे स्वीकार नहीं कर पाता। क्योंकि सत्य "बदलने अर्थात  परिवर्तन" की मांग करता है — सोच बदलने की, आदतें बदलने की, और कभी-कभी खुद को बदलने की।

और बदलाव हमेशा असुविधाजनक होता है। इसलिए मन उस असत्य के साथ बना रहता है जहाँ उसे आराम मिलता है, भले ही वो झूठ अस्थाई हो, खोखला हो या भ्रम हो।

इस लगाव में एक अजीब-सी सुरक्षा छिपी रहती है — पर ये सुरक्षा नहीं, एक तरह की मानसिक कैद है।


जो सत्य को देख सकता है, फिर भी असत्य का साथ देता है — वो बाहरी दुनिया से नहीं, अपने ही मन से, स्वयं से पराजित हो चुका होता है।

क्योंकि सत्य कभी मजबूर नहीं करता, बस दर्पण की तरह सामने खड़ा रहता है।

और असत्य? वो सुन्दर भ्रम बनकर मन को बहलाता है, क्योंकि सच का तेज़ प्रकाश उन सचाइयों को नग्न कर देता है जिन्हें हम छुपाना चाहते हैं।

यही अंतर है — स्वतंत्र सोच और मानसिक गुलामी में।


होश और साहस वही रखते हैं जो सत्य को देखकर उससे भागते नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करते हैं। क्योंकि सत्य तक पहुँचना आसान नहीं — इसमें सवाल उठते हैं, आत्मचिंतन होता है और कभी–कभी अपनी ही धारणाओं को तोड़ना पड़ता है। पर जो असत्य के मोह में जी रहा है, वह बस भीड़ का हिस्सा होता है।

सोच स्वतंत्र तभी होती है जब व्यक्ति झूठ की सुविधा को छोड़कर सत्य की कठोरता पर शांत शरण चुन लेता है — वहीं से असली स्वतंत्रता की शुरुआत होती है।


"सच देखने की ताक़त तो बहुतों के पास होती है,

पर उसे स्वीकार करने का साहस बहुत कम के पास,

क्योकि वे इस तथ्य से अवगत ही नही कि सत्य परेशान कर सकता है, पर असत्य गुलाम बना देता है।