ईश्वर का जन्म विविध कलाओं के साथ होता है परन्तु पुरुष की उत्पत्ति पञ्च कलाओं के साथ होती है :-
एक बहुत ही सुंदर दृष्टांत...
“ब्राह्मण – जाति नहीं , जिम्मेदारी है...!!"
अब तो शास्त्र ही कम लोग पढ़ते हैं और यदि पढ़ते भी हैं तो किसी पूर्व स्थापित मत पर ही स्थिर रहते हैं। शोध परक विचारों की संख्या अत्यन्त न्यून हैं।
शास्त्रों पर शोध परक विचार, अनुसन्धान आदि प्रारम्भ से ही होते आये हैं, इन्हीं के कारण आज बहुत सी स्थापित मान्यताएँ स्थिर हुई हैं।
षड्दर्शन आदि तो प्रसिद्ध ही हैं, मध्य कालीन भारत के महान दार्शनिकों ने तब के प्रचलित सिद्धांतों को स्वीकार करते हुए, उनके आधार पर शास्त्रों में सामंजस्य स्थापित करते हुए एक मत की स्थापना की और परवर्ती युग में जैसे ही उन्हें यह प्रतीत हुआ कि इसमें परिष्कार की आवश्यकता है, वैसे ही उनमें परिष्कार करते हुए अन्य परिष्कृत सिद्धांतों के प्रतिपादन में भी संकोच नहीं किया।
इसी क्रम में न्याय शास्त्र में एक मनोरंजक प्रश्नोत्तर प्राप्त होता है जिसमें तब के प्रचलित मत के अनुसार एक अस्पष्ट समाधान निकाल लिया गया था और कालान्तर में इनमें ही परिष्कार करते हुए परिष्कृत समाधान भी निकला।
न्याय कन्दली के अनुसार प्रश्नोत्तर इस प्रकार है :---
यद् गच्छति तत् सन्निहितव्यवहितार्थौ क्रमेण प्राप्नोति।
तत्कथं शाखा चन्द्रमसोस्तुल्यकालोपलब्धिः।
अर्थात् यदि आँखों से किरणें निकलकर बाह्य वस्तु के साथ संयुक्त होकर चाक्षुष प्रत्यक्ष को सिद्ध करती हैं, तो वृक्ष की शाखा तथा चन्द्रमा इन दोनों की युगपत् अथवा एक साथ उपलब्धि किस प्रकार सम्भव होती है। क्योंकि आँखों की किरणों का शाखा की अपेक्षा चन्द्रमा तक जाने में कुछ अधिक समय अवश्य लगेगा। ऐसी दशा में शाखा दर्शन से कुछ समय पश्चात् चन्द्रमा दिखाई पड़ना चाहिये। फिर भी वह शाखा दर्शन के साथ ही किस प्रकार दिखाई पड़ता है।
इसका समाधान न्याय कन्दली ने यह दिया गया कि :--
इन्द्रियवृत्तेराशुसञ्चारित्वात् पलाशशतव्यतिभेदवत् क्रमाग्रहणनिमित्तोऽयं भ्रमो, न तु वास्तवं यौगपद्यम्।
अर्थात् वास्तव में तो शाखा के पश्चात् ही चन्द्रमा दिखाई पड़ता है। पर यह कार्य इतनी तीव्रता से होता है कि हमें क्रमिकता का बोध न होकर युगपत् अर्थात् एक साथ प्रतीति होती है। जिस प्रकार यदि सौ कमल के पत्तों में सुई से छेद किया जाय तो स्पष्टतः गणित के तर्क के अनुसार एक के पश्चात् अन्य में क्रम से ही छेद बनेगा। पर तीव्रता के कारण हमें ऐसा लगता है कि सभी पत्तों में एक साथ छेद हो गया है। इसी प्रकार यहाँ भी शाखा-चन्द्र दर्शन क्रमिक होकर भी युगपत् प्रतीत होता है।
न्याय शास्त्र में तीव्रता को प्रकट करने के लिये यह ‘कमल के पत्ते का दृष्टान्त’ इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसने बाद में न्याय का रूप ही ले लिया। तत्त्व चिन्तामणि, प्रत्यक्षखण्ड पर मथुरानाथ टीका में इसे 'शतपत्र-भेद न्याय’ बताते हुये निरूपित किया है।
उपर्युपरिस्थितशतसंख्यकपत्राणां सूच्या युगपद् भेद-भ्रमविषयाणामपि वस्तुत: एकभेदानन्तरमपरमेदः।
--- तत्त्वचिन्तामणि पर मथुरानाथ टीका।
मन की एक अत्यंत सूक्ष्म गिरह है - 'किसी का समर्पण' यह वह गिरह नहीं है जो दर्द से कसती है, बल्कि वह जो ज़िम्मेदारी की गरमाहट से धीरे-धीरे और मजबूत हो जाती है।
जब कोई व्यक्ति अपने मन का सबसे उजला हिस्सा, सबसे कोमल स्पंदन, और अपने भीतर की पूर्ण निष्ठा
आपके हाथों में रख देता है तो वह प्रेम नहीं, एक प्रकार का आत्म-निवेदन होता है।
ऐसे में किसी के समर्पण को हल्के में लेना केवल उस व्यक्ति के प्रति अन्याय नहीं है बल्कि स्वयं की संवेदनशीलता पर भी प्रश्नचिह्न की तरह है।
समर्पण न माँगा जा सकता है, न खरीदा जा सकता है...यह तो बस मिल जाता है, उन पलों में जब कोई हृदय
हम पर विश्वास करने का निर्णय ले लेता है।
और तब मन को बहुत सतर्क होना पड़ता है, क्योंकि प्रेम में सबसे बड़ी गिरह तब पड़ती है जब किसी ने हमपर बहुत भरोसा करके हमारा हाथ थामा हो और हम उसके प्रतिदान में अनिश्चितता दे बैठें।
यदि कोई तुम्हारे प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है तो यह केवल सौभाग्य नहीं है, यह #एक_मौन_उत्तरदायित्व भी है।
इतना प्रयत्न जरूर करना कि उसके विश्वास में कभी दरार न आए और उसके समर्पण को कभी पछतावे का रंग न छू पाए।
क्योंकि किसी की निष्ठा की रक्षा करना सबसे सुंदर,
सबसे कोमल, और सबसे दुर्लभ मनुष्यता है। इस मनुष्यता को बचाए रखना तुम्हारा - मेरा - हम सबका उत्तरदायित्व है।
पूरा ब्रह्मांड एक ही मूल चेतना से बना है — वही चेतना जो हर जीव, हर पेड़, हर तारे और हर परमाणु में अलग-अलग रूप में प्रकट होती है। यह चेतना कोई वस्तु नहीं, बल्कि वह ऊर्जा का अनुभव है जो सबको जोड़ती है। जिस तरह एक ही सागर से असंख्य लहरें उठती हैं और फिर उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी तरह हर जीव, चाहे वह इंसान हो या एक कण, उसी एक ब्रह्मांडीय चेतना की लहर है।
विज्ञान और अध्यात्म दोनों इस सत्य की झलक देते हैं। क्वांटम स्तर पर देखा जाए तो हर कण एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है, मानो वे किसी अदृश्य जाल का हिस्सा हों। वहीं ध्यान और आत्मचेतना के अनुभव में भी व्यक्ति यह महसूस करता है कि “मैं” और “दूसरे” के बीच की सीमाएँ केवल भ्रम हैं — वास्तविकता में सब कुछ एक ही कंपन, एक ही ऊर्जा की अभिव्यक्ति है।
यह समझ हमारे भीतर गहरी करुणा और संतुलन जगाती है। जब हम जान लेते हैं कि हर जीव में वही चेतना प्रवाहित है जो हमारे भीतर है, तो द्वेष मिटने लगता है और एकता का अनुभव जन्म लेता है। यही वह बिंदु है जहाँ विज्ञान, अध्यात्म और प्रेम — तीनों एक हो जाते हैं।
ये एक कड़वा सत्य है कि आप न तो सभी को प्रसन्न रख सकते हैं और न ही सभी के दुःखों को समाप्त कर सकते हैं। लोग अपनी-अपनी यात्राओं, अपनी तकलीफ़ों और अपनी परिस्थितियों के साथ जीते हैं और आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, हर किसी की राह आपके हाथों से नहीं बदल सकती। सबसे कठिन बात यही होती है कि जो सबसे अधिक मदद करना चाहता है, वही अक्सर सबसे अधिक थक जाता है। ऐसे लोग अपने भीतर एक गहरी करुणा लेकर चलते हैं। वे हर दर्द को महसूस करते हैं, हर पुकार को सुनते हैं, और हर तकलीफ में खुद को भी थोड़ा टूटता हुआ पाते हैं। पर सच यही है कि यदि आप खुद मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से स्थिर नहीं हैं, तो आपका कोई भी सुझाव, कोई भी सहानुभूति, कोई भी प्रयास स्थायी नहीं होगा। खाली बर्तन किसी को पानी नहीं दे सकता और खाली मन, थका हुआ शरीर या अस्थिर जीवन किसी की पीड़ा को सँभाल नहीं सकता। दूसरी ओर इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिनके पास शक्ति है, संसाधन हैं, सामर्थ्य है और सक्षम होने की हर कसौटी पर वे पूरे उतरते हैं। लेकिन उनमें से कई अपने ही दायरों, अपने अहंकार, अपनी महत्वाकांक्षाओं में इतने उलझे रहते हैं कि उन्हें दूसरों के दर्द दिखाई ही नहीं देते। उन्हें लगता है समय हमेशा उनके लिए रुककर खड़ा रहेगा, जैसे ज़िंदगी ने उन्हें कोई विशेष छूट दे रखी हो। वे मदद इसलिए नहीं करते कि वे नहीं कर सकते, वे इसलिए नहीं करते कि उन्हें इसकी आवश्यकता महसूस ही नहीं होती। और यही असमानता इस दुनिया का सबसे बड़ा विरोधाभास है: जो मदद करना चाहता है वो सक्षम नहीं; और जो सक्षम है वो अपने ही बनाए हुए सिंहासन में व्यस्त है। लेकिन इस पूरी जटिलता में एक सबसे महत्वपूर्ण सीख छुपी है। आपका पहला कर्तव्य स्वयं के प्रति है। खुद को संभालें, खुद को स्थिर रखें और अपनी ऊर्जा उसी जगह प्रयोग करें जहाँ वास्तव में उसका असर पड़ता हो। दुनिया का हर बोझ आपके कंधों पर नहीं है, और हर दुःख आपकी जिम्मेदारी भी नहीं है। आप इंसान हैं कोई चमत्कारी देवता नहीं। कभी-कभी दूरी रखना भी मदद का ही एक रूप होता है, क्योंकि जब आप खुद को सुरक्षित रखते हैं, तभी आप किसी का हाथ पकड़ने की क्षमता बनाए रखते हैं। लोग आपको हमेशा अपने अनुसार ढालना चाहेंगे। कोई चाहेगा आप हमेशा उपलब्ध रहें। कोई चाहेगा आप हमेशा धैर्य रखे रहें....!!!!!
एक बार एक राजा ने सपने मे देखा कि उसके सारे दांत गिर गए है। राजा ने एक ज्योतिष को बुलाकर इस सपने का प्रभाव पूछा " ज्योतिषी बोला " महाराज सारे दांत गिर जाने का अर्थ है आपके सामने आपके सारे संबंधी मर जायेगें। और आप अकेले रह जायेगें।" ये सुनकर राजा को उस ज्योतिष पर गुस्सा आया। और ज्योतिष को जेल के डाल दिया। फिर दूसरे ज्योतिष को को बुलाकर उससे सपने का संकेत पूछा " दूसरा ज्योतिष बोला " महाराज सपना शुभ संकेत दे रहा है। आपकी आयु बहुत लम्बी होगी। और आप सौ साल जियेंगे। राजा बहुत खुश हुआ। और ज्योतिष को बहुत सारा धन इनाम मे दिया। दोनों ज्योतिष ने एक जैसा ही प्रभाव बताया था मगर दूसरे ज्योतिष के शब्द सकारात्मक थे।
कहानी का मोरल :- यहाँ हर कोई अपने फायदे की खबर सुनना चाहता है। चाहे वह झूठे ही क्यों न हो। इसलिए नेगेटिव बात या तो बताएं ही नही अगर बतानी जरूरी है तो पोजेटिव तरीके से बताएं। वरना सामने वाला बेवजह आपका दुश्मन बन जायेगा।
कभी-कभी इंसान सत्य को जानता है, समझता भी है, पर उसे स्वीकार नहीं कर पाता। क्योंकि सत्य "बदलने अर्थात परिवर्तन" की मांग करता है — सोच बदलने की, आदतें बदलने की, और कभी-कभी खुद को बदलने की।
और बदलाव हमेशा असुविधाजनक होता है। इसलिए मन उस असत्य के साथ बना रहता है जहाँ उसे आराम मिलता है, भले ही वो झूठ अस्थाई हो, खोखला हो या भ्रम हो।
इस लगाव में एक अजीब-सी सुरक्षा छिपी रहती है — पर ये सुरक्षा नहीं, एक तरह की मानसिक कैद है।
जो सत्य को देख सकता है, फिर भी असत्य का साथ देता है — वो बाहरी दुनिया से नहीं, अपने ही मन से, स्वयं से पराजित हो चुका होता है।
क्योंकि सत्य कभी मजबूर नहीं करता, बस दर्पण की तरह सामने खड़ा रहता है।
और असत्य? वो सुन्दर भ्रम बनकर मन को बहलाता है, क्योंकि सच का तेज़ प्रकाश उन सचाइयों को नग्न कर देता है जिन्हें हम छुपाना चाहते हैं।
यही अंतर है — स्वतंत्र सोच और मानसिक गुलामी में।
होश और साहस वही रखते हैं जो सत्य को देखकर उससे भागते नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करते हैं। क्योंकि सत्य तक पहुँचना आसान नहीं — इसमें सवाल उठते हैं, आत्मचिंतन होता है और कभी–कभी अपनी ही धारणाओं को तोड़ना पड़ता है। पर जो असत्य के मोह में जी रहा है, वह बस भीड़ का हिस्सा होता है।
सोच स्वतंत्र तभी होती है जब व्यक्ति झूठ की सुविधा को छोड़कर सत्य की कठोरता पर शांत शरण चुन लेता है — वहीं से असली स्वतंत्रता की शुरुआत होती है।
"सच देखने की ताक़त तो बहुतों के पास होती है,
पर उसे स्वीकार करने का साहस बहुत कम के पास,
क्योकि वे इस तथ्य से अवगत ही नही कि सत्य परेशान कर सकता है, पर असत्य गुलाम बना देता है।