Tuesday, 9 December 2025

प्रेम' में किए गए समर्पण को सँभालना

मन की एक अत्यंत सूक्ष्म गिरह है - 'किसी का समर्पण' यह वह गिरह नहीं है जो दर्द से कसती है, बल्कि वह जो ज़िम्मेदारी की गरमाहट से धीरे-धीरे और मजबूत हो जाती है।


जब कोई व्यक्ति अपने मन का सबसे उजला हिस्सा, सबसे कोमल स्पंदन, और अपने भीतर की पूर्ण निष्ठा

आपके हाथों में रख देता है तो वह प्रेम नहीं, एक प्रकार का आत्म-निवेदन होता है।


ऐसे में किसी के समर्पण को हल्के में लेना केवल उस व्यक्ति के प्रति अन्याय नहीं है बल्कि स्वयं की संवेदनशीलता पर भी प्रश्नचिह्न की तरह है।


समर्पण न माँगा जा सकता है, न खरीदा जा सकता है...यह तो बस मिल जाता है, उन पलों में जब कोई हृदय

हम पर विश्वास करने का निर्णय ले लेता है।


और तब मन को बहुत सतर्क होना पड़ता है, क्योंकि प्रेम में सबसे बड़ी गिरह तब पड़ती है जब किसी ने हमपर बहुत भरोसा करके हमारा हाथ थामा हो और हम उसके प्रतिदान में अनिश्चितता दे बैठें।


यदि कोई तुम्हारे प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है तो यह केवल सौभाग्य नहीं है, यह #एक_मौन_उत्तरदायित्व भी है।

इतना प्रयत्न जरूर करना कि उसके विश्वास में कभी दरार न आए और उसके समर्पण को कभी पछतावे का रंग न छू पाए।


क्योंकि किसी की निष्ठा की रक्षा करना सबसे सुंदर,

सबसे कोमल, और सबसे दुर्लभ मनुष्यता है। इस मनुष्यता को बचाए रखना तुम्हारा - मेरा - हम सबका उत्तरदायित्व है।

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