अनंत शून्य का वैभव
कल्पना कीजिए, एक ऐसी अवस्था जहां कुछ भी नहीं था—न आकाश, न धरती, न सूर्य, न तारे। समय भी नहीं था, इसलिए 'पहले' और 'बाद' का कोई अर्थ नहीं था। सिर्फ़ था तो एक अनंत शून्य, जो न प्रकाश था, न अंधकार, न शांति, न अशांति—बस एक निर्वात, जिसमें कुछ भी व्यक्त नहीं हुआ था।
यह महाशून्य कोई साधारण शून्य नहीं था," वृद्ध आचार्य विश्वनाथ अपने शिष्यों को समझाते हुए कहते हैं। "यह वह स्थिति थी, जहां सब कुछ था, पर किसी भी रूप में नहीं था। यह निरंजन का निवास था—वह जो निर्लेप है, निर्मल है, जो किसी सीमा में नहीं बंधता।"
निरंजन वहाँ थे, पर किसी रूप में नहीं। वे केवल अस्तित्व मात्र थे—निराकार, निर्गुण, असीम। उनके होने और न होने में कोई भेद नहीं था। यह वह अवस्था थी जो चेतना के सभी स्तरों से परे थी, जहां विरोधाभास भी एकाकार हो जाते हैं।
"बाबा, यह कैसे हो सकता है?" एक छोटा शिष्य, रघु, जिज्ञासा से पूछता है। "कुछ है, तो उसका रूप तो होगा ही?"
आचार्य मुस्कुराते हैं, "बेटा, जब तुम सपने में कोई दुनिया देखते हो, तो वह कहां से आती है? वह तुम्हारे भीतर होती है, पर सपने के पहले वह कहीं नहीं होती। वैसे ही, निरंजन का अस्तित्व सब कुछ था, पर किसी रूप में व्यक्त नहीं था।"
निरंजन का जागरण
फिर एक क्षण आया—हालांकि 'क्षण' शब्द भी सही नहीं, क्योंकि तब समय था ही नहीं—जब निरंजन में एक हलचल हुई। एक अनदेखा स्पंदन, एक अनकही हलचल, जिसे हम 'जागरण' कह सकते हैं।
"क्या निरंजन भी अकेलेपन से ऊब गए थे?" छोटी राधा उत्सुकता से पूछती है।
आचार्य हंसते हैं, "राधा, अकेलापन और ऊब तो मनुष्य के गुण हैं। निरंजन तो पूर्ण हैं, उन्हें कुछ भी पाने की आवश्यकता नहीं। पर हां, उनमें स्वयं को जानने, स्वयं को अनुभव करने की एक इच्छा जगी।"
यह पहला संकल्प था—'मैं एक हूं, अनेक हो जाऊं'—और यहीं से सृष्टि का आरंभ हुआ।
सृष्टि का प्रथम स्पंदन
निरंजन ने सोचा, "मैं कौन हूं?" और इसी प्रश्न ने एक हलचल उत्पन्न कर दी। पूरे महाशून्य में एक कंपन दौड़ गया—एक ऊर्जा जो अब व्यक्त होना चाहती थी।
यही ऊर्जा 'आदिशक्ति' कहलाती है। यह निरंजन का ही स्वरूप थी, पर अब अभिव्यक्ति के एक नए रूप में थी। जैसे बीज में पूरा वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इस आदिशक्ति में संपूर्ण ब्रह्मांड का बीज था।
फिर एक विस्फोट हुआ—एक ऐसा प्रकाश, जिसने शून्य को भर दिया। विज्ञान इसे 'बिग बैंग' कहता है, पर संत इसे कहते हैं—सृष्टि का जन्म। अनगिनत कण चारों ओर फैल गए, जो आगे चलकर तारों, ग्रहों, आकाशगंगाओं का निर्माण करने वाले थे।
"लेकिन बाबा," चंदन पूछता है, "अगर निरंजन पूर्ण थे, तो यह सृष्टि क्यों बनाई?"
"क्योंकि यह आनंद का खेल था," आचार्य समझाते हैं। "जैसे बच्चे खेलते हैं बिना किसी कारण के, वैसे ही यह सृष्टि निरंजन की लीला है।"
लीला का प्रारंभ
अब जो पहले एक थे, वे अनेक रूपों में विभक्त होने लगे। निरंजन ने सबसे पहले पांच महातत्वों की रचना की—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। इनसे सारा भौतिक जगत बना।
"पर बाबा," राधा फिर पूछती है, "इसका हमसे क्या संबंध?"
"राधा," आचार्य कोमलता से कहते हैं, "वही निरंजन तुम्हारे भीतर भी हैं। तुम्हारी सांसों में, तुम्हारे विचारों में, तुम्हारी आत्मा में। वे कहीं बाहर नहीं, तुम्हारे अंदर ही हैं।"
आत्मा का आगमन
भौतिक जगत तैयार होने के बाद, निरंजन ने अपने ही एक अंश को आत्मा का रूप देकर, इसे शरीरों में प्रविष्ट कराया। आत्मा ही वह चैतन्य थी, जिससे जड़ पदार्थ में जीवन का संचार हुआ।
"अब मैं तुम्हें एक रहस्य बताता हूं," आचार्य धीरे से कहते हैं, "हर आत्मा का एक ही उद्देश्य है—अपने मूल स्रोत, निरंजन को पहचानना और उसमें विलीन हो जाना।"
देवों की उत्पत्ति
निरंजन ने ब्रह्मांड के संतुलन के लिए देवताओं की रचना की। ब्रह्मा, विष्णु और महेश को क्रमशः सृष्टि, पालन और संहार का कार्य सौंपा गया।

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