Friday, 30 January 2026

मनुष्य का मूल्य

मनुष्य का मूल्य उसके पास मौजूद जानकारी से नहीं आँका जाता अपितु उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि वह ज्ञान के साथ कैसा व्यवहार करता है अतः  जो व्यक्ति सच में ज्ञानी होता है वह सारा जीवन स्वयं को अधूरा मानता है।। उसे यह स्पष्ट बोध होता है कि उसका अनुभव सीमित है और संसार उससे कहीं बड़ा है और इसी बोध के कारण वह सीखता है पूछता है सुनता है और धैर्यपूर्वक निष्कर्ष तक पहुँचता है।।मूर्ख व्यक्ति इसके ठीक विपरीत होता है  वह स्वयं को पूर्ण मानता है और उसे लगता है कि उसे सब पता है।। इसी भ्रम के कारण उसके भीतर सीखने की कोई आवश्यकता नहीं बचती अतः जब भीतर प्रश्न नहीं होते, तब बाहर केवल राय बचती है इसलिए वह हर विषय पर बोलता है, चाहे उसका उससे कोई संबंध अनुभव या अभ्यास न हो।।
ज्ञानी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसका संयम है।। वह बोलने में उतना ही नियंत्रित होता है जितना सीखने में तत्पर होता है  वह जानता है कि हर विषय पर बोलना बुद्धिमानी नहीं है क्योंकि हर विषय पर जान पाना संभव ही नहीं है।।
राजनीति पर बोलने से पहले वह इतिहास और वर्तमान दोनों को समझने का प्रयास करता है।। बाजार पर राय बनाने से पहले वह आँकड़ों जोखिम और वास्तविकता को देखता है।। समाज पर टिप्पणी करने से पहले वह स्वयं को समाज से अलग नहीं मानता, बल्कि उसका अंग समझता है।। 
वह सलाह तभी देता है जब उससे माँगी जाए  और तब भी वही बात कहता है, जिसे उसने स्वयं अपने जीवन में परखा हो अतः उसकी बातों में दिखावा नहीं होता अपितु समाधान होता है।।
मूर्ख व्यक्ति का सबसे स्पष्ट लक्षण अतिआत्मविश्वास होता है अतः वह बिना जाने बिना समझे और बिना अनुभव किए ही  स्वयं को विशेषज्ञ मानता है।। बाजार क्यों गिरा उसे पता होता है राजनीति कैसे सुधरेगी, इसका हल भी उसी के पास होता है।। खेल में कौन गलत खेल रहा है यह भी वही तय करता है समाज, रिश्ते, पैसा और जीवन  हर विषय पर उसके पास राय होती है।।
लेकिन उसके जीवन में उन रायों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता अतः जो व्यक्ति धन कमाने की सलाह देता है, वह स्वयं आर्थिक अस्थिरता में जी रहा होता है  जो व्यक्ति संबंधों पर उपदेश देता है, उसके अपने रिश्ते टूटे होते हैं।। जो व्यक्ति समाज सुधार की बातें करता है उसका स्वयं का व्यवहार अव्यवस्थित होता है।।
मूर्ख व्यक्ति सीखता नहीं, क्योंकि सीखने के लिए पहले यह स्वीकार करना पड़ता है कि मुझे नहीं पता और यही उसका अहंकार यह स्वीकार कभी नहीं करता।।
आज के समय में राय देना सबसे आसान कार्य बन चुका है क्योंकि मंच हैं माध्यम है, श्रोता हैं लेकिन बोलने का अवसर मिल जाना ज्ञान का प्रमाण नहीं होता राय देना किसी श्रम की माँग नहीं करता जबकि सीखना समय धैर्य और अनुशासन माँगता है।।
मूर्ख व्यक्ति श्रम से बचता है और राय के माध्यम से स्वयं को महत्वपूर्ण अनुभव करता है उसे लगता है कि अधिक बोलने से वह अधिक बुद्धिमान सिद्ध होगा जबकि वास्तविकता यह है कि निरंतर बोलना अक्सर भीतर की रिक्तता को छिपाने का प्रयास होता है।।
ज्ञानी व्यक्ति जीवन भर सीखता है और अंत तक स्वयं को अधूरा मानता है और मूर्ख व्यक्ति जीवन भर बोलता है और स्वयं को पूर्ण समझता है ज्ञानी की पहचान उसके प्रश्नों से होती है, मूर्ख की पहचान उसके उत्तर से होती है।।
अतः जो व्यक्ति सीखना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे वास्तविकता से कट जाता है और जो व्यक्ति सीखता रहता है वही समय समाज और जीवन के साथ आगे बढ़ता है।।
अतः निष्कर्ष यह है कि जिज्ञासा और आत्मस्वीकृति  ये बुद्धिमत्ता के स्थायी संकेत हैं जबकि अति राय अति सलाह और अति दिखावा  केवल मूर्खता के  लक्षण हैं।।

जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है शेष सब कुछ केवल श्री भगवान ही जानते हैं क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब श्री भगवान ही हैं।।

डॉ सुशील कश्यप 

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