Saturday, 27 December 2025

अतृप्त इच्छाएं(भूख

मनुष्य की इच्छाएं ही बंधन है बार बार जन्मों की । ये ऐसी भूख है जो कभी तृप्त नही होती। तन की भूख,मन की भूख, बुद्धि अहंकार की भूख सदैव अतृप्त रहती है अगर ईश्वरमय जीवन न हो तो कर्म और फल , कर्म और फल का चक्कर शुरू रहता है। 

   भूख ही इस संसार का नियम है , भूख के ही कारण , पाप अधर्म है ! कोई किसी को नष्ट्त कर रहा है तो कोई किसी को , जबकि भूख केवल इस असत्य माया में है ! आत्मा को भूख नहीं लगती , भूख , ( शरीर / पेट / मन ) को  ही लगती है ! क्या हम शरीर मन मस्तिष्क हैं ,या हम आत्मा हैं ? साधना ध्यान तपस्या में हम मन को ही वश में करके आगे बढ़ते हैं ! अगर समाधि लग गई , तो समझिए असत्य इंद्रियां शांत , शरीर मृत्यु पर हम पुनः इस संसार में नहीं आएंगे ! अगर भूखे  निपटे तो आना ही पड़ेगा !

नब्बे प्रतिशत जड़ मानव द्वारा भोग हो चुके हैं ! जड़ /चेतन नियम अनुसार  उन नब्बे प्रतिशत चेतन और उनके आने वाले असंख्य वंश , मौजूदा धरती पर उपलब्ध 10 प्रतिशत जड़ में ही जनम लेंगे , इसीलिए हर (पशु प्राणी मानव) की जानसख्या अत्याधिक है !

माया में मौजूद सारे प्रश्न सारे उत्तर असत्य हैं , जहां से प्रश्न अवतरित होते हैं , वह मन ही असत्य माया का एक असत्य पिंड मात्र  है ! जब प्रश्न समाप्त तब आगे की यात्रा स्वतंत्र हो जाती है ! मूल प्रश्न यह नहीं धर्मयुद्ध कब होगा ? कैसे होगा ? कौन बचेगा , कितने बचेंगे ? जो बचेंगे वो भी अमर थोड़े हो जाएंगे , शरीर तो भगवान का भी अमर नहीं इस धरती पर ! मूल प्रश्न यह है , इस यात्रा में जाना कहां है ! इस धरती पर युद्दद्ध कभी समाप्त नहीं हो सकते ! जब तक भूख है तब तक युद्दद्ध है ! युद्दद्ध और शांत्ति एक दूसरे के विपरीत है ! इस माया से भूख कभी खतम नहीं किया जा सकता ! भूख पर नियन्त्रण ही परमानंद तक पहुंचाएगा ! वहां न भूख होंगी ना ही युद्ध , कुछ होगा तो वो होगा सदचितआनन्द !

   भागवत गीता द्वारा भगवान श्री कृष्ण ने जीव को मुक्ति के सरल मार्ग दिखाते है।

  भगवद गीता की अठारह बातों को अपनाकर अपने जीवन में उतारता है वह सभी दुखों से, वासनाओं से, क्रोध से, ईर्ष्या से, लोभ से, मोह से, लालच आदि के बंधनों से मुक्त हो जाता है। आगे जानते हैं भगवद गीता की 18 ज्ञान की बातें।

1. आनंद मनुष्य के भीतर ही निवास करता है। परंतु मनुष्य उसे स्त्री में, घर में और बाहरी सुखों में खोज रहा है।

2. श्रीकृष्ण कहते हैं कि भगवान उपासना केवल शरीर से ही नहीं बल्कि मन से करनी चाहिए। भगवान का वंदन उन्हें प्रेम-बंधन में बांधता है।

3. मनुष्य की वासना ही उसके पुनर्जन्म का कारण होती है।

4. इंद्रियों के अधीन होने से मनुष्य के जीवन में विकार और परेशानियां आती है।

5. संयम यानि धैर्य, सदाचार, स्नेह और सेवा जैसे गुण सत्संग के बिना नहीं आते हैं।

6. श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को वस्त्र बदलने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता हृदय परिवर्तन की है।

7. जवानी में जिसने ज्यादा पाप किए हैं उसे बुढ़ापे में नींद नहीं आती।

8. भगवान ने जिसे संपत्ति दी है उसे गाय अवश्य रखनी चाहिए।

9. जुआ, मदिरापान, परस्त्रीगमन (अनैतिक संबंध), हिंसा, असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता इन सब में कलियुग का वास है।

10. अधिकारी शिष्य को सद्गुरु (अच्छा गुरु) अवश्य मिलता है।

11. श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को अपने मन को बार-बार समझाना चाहिए कि ईश्वर के सिवाय उसका कोई नहीं है। साथ ही यह विचार करना चाहिए कि उसका कोई नहीं है। साथ ही वह किसी का नहीं है।

12. भोग में क्षणिक (क्षण भर के लिए) सुख है। साथ ही त्याग में स्थायी आनंद है।

13. श्रीकृष्ण कहते हैं कि सत्संग ईश्वर की कृपा से मिलता है। परंतु कुसंगति में पड़ना मनुष्य के अपने ही हाथों में है।

14. लोभ और ममता (किसी से अधिक लगाव) पाप के माता-पिता हैं। साथ ही लोभ पाप का बाप है।

15. श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्त्री का धर्म है कि रोज तुलसी और पार्वती का पूजन करें।

16. मनुष्य को अपने मन और बुद्धि पर विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि ये बार-बार मनुष्य को दगा देते हैं। खुद को निर्दोष मानना बहुत बड़ा दोष है।

17. यदि पति-पत्नी को पवित्र जीवन बिताएं तो भगवान पुत्र के रूप में उनके घर आने की इच्छा रखते हैं।

18. भगवान इन सभी कसौटियों पर कसकर, जांच-परखकर ही मनुष्य को अपनाते हैं।

    अपने इष्टदेवमे ओतप्रोत होकर उनके मय बन जाना मार्ग है इन आवागमन से बचने का।

  भगवान श्रीकृष्ण की आप सभी धर्मप्रेमी जनो पर सदैव कृपा हो यही प्रार्थना सह.. श्री मात्रेय नमः

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