बौद्धिक क्षमता का विकास और धारणाओं का परिष्करण
विश्लेषण
बौद्धिक क्षमता का विकास और धारणाओं का परिष्करण
सुनने में यह बहुत भारी और अच्छा लगता है, लेकिन अध्यात्म की यात्रा में यही सबसे बड़ी रुकावट साबित
हुआ है। क्यो,
बुद्धि का काम है चीजों को परिभाषित करना।
लेबल लगाना।
हम 'ईश्वर' या 'शून्य' की इतनी सटीक परिभाषा बना लेते हैं कि शब्दों को ही अनुभव मान बैठते हैं।
यह वैसे ही है जैसे प्यास लगने पर 'पानी' शब्द को रटना। इससे प्यास नहीं बुझती, बस भ्रम गहरा हो जाता है कि हम कुछ जानते हैं।
तर्क का स्वभाव है काटना। 'ये' अलग और 'वो' अलग।
अध्यात्म जुड़ना है।
एक होना है।
जितनी तेज बुद्धि होगी, वह उतनी ही बारीकी से 'मैं' और 'अस्तित्व' के बीच दीवार खड़ी करेगी। एक बुद्धिमान आदमी के लिए झुकना सबसे मुश्किल है। उसका तर्क उसे मिटने
नहीं देता है।
धारणाओं को परिष्कृत करना मतलब क्या है लोहे की जंजीर को सोने की जंजीर से बदल देना।
बुरे विचारों को अच्छे विचारों से बदल भी दिया, तो क्या हुआ?
बांधा तो विचार में ही है।
यहाँ 'आध्यात्मिक अहंकार' चुपके से बैठ जाता है।
"मैं ज्ञानी हूँ", "मैं सात्विक हूँ"।
यह अहंकार सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह पवित्रता के कपड़े पहनकर बैठा है। इसे पकड़ना मुश्किल है।
बुद्धि हमेशा विश्लेषण करती है।
ध्यान में भी हम सोचते रहते हैं क्या हो रहा है, क्या यह सही है या गलत।
अध्यात्म नदी में कूदने जैसा है आप किनारे पर खड़े होकर पानी का तापमान नाप रहे हैं।
विश्लेषण आपको कभी अनुभव में डूबने नहीं देगा।
वह आपको हमेशा सतह पर रखेगा।
मै कहता हूं आखिर में
बुद्धि का काम सिर्फ दरवाजे तक पहुचाना है।
मंदिर के अंदर जाने से पेहेले चप्पल और दिमाग( बुद्धि), दोनों बाहर उतार देते है।
वहाँ सोचने का उपयोग ही
नही है।
वहाँ सिर्फ होना होता है।
तर्क का अंतिम उपयोग यही है कि वह अपनी ही व्यर्थता को समझ ले और शांत हो जाए।

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