सभी को प्रसन्न रखना संभव है
ये एक कड़वा सत्य है कि आप न तो सभी को प्रसन्न रख सकते हैं और न ही सभी के दुःखों को समाप्त कर सकते हैं। लोग अपनी-अपनी यात्राओं, अपनी तकलीफ़ों और अपनी परिस्थितियों के साथ जीते हैं और आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, हर किसी की राह आपके हाथों से नहीं बदल सकती। सबसे कठिन बात यही होती है कि जो सबसे अधिक मदद करना चाहता है, वही अक्सर सबसे अधिक थक जाता है। ऐसे लोग अपने भीतर एक गहरी करुणा लेकर चलते हैं। वे हर दर्द को महसूस करते हैं, हर पुकार को सुनते हैं, और हर तकलीफ में खुद को भी थोड़ा टूटता हुआ पाते हैं। पर सच यही है कि यदि आप खुद मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से स्थिर नहीं हैं, तो आपका कोई भी सुझाव, कोई भी सहानुभूति, कोई भी प्रयास स्थायी नहीं होगा। खाली बर्तन किसी को पानी नहीं दे सकता और खाली मन, थका हुआ शरीर या अस्थिर जीवन किसी की पीड़ा को सँभाल नहीं सकता। दूसरी ओर इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जिनके पास शक्ति है, संसाधन हैं, सामर्थ्य है और सक्षम होने की हर कसौटी पर वे पूरे उतरते हैं। लेकिन उनमें से कई अपने ही दायरों, अपने अहंकार, अपनी महत्वाकांक्षाओं में इतने उलझे रहते हैं कि उन्हें दूसरों के दर्द दिखाई ही नहीं देते। उन्हें लगता है समय हमेशा उनके लिए रुककर खड़ा रहेगा, जैसे ज़िंदगी ने उन्हें कोई विशेष छूट दे रखी हो। वे मदद इसलिए नहीं करते कि वे नहीं कर सकते, वे इसलिए नहीं करते कि उन्हें इसकी आवश्यकता महसूस ही नहीं होती। और यही असमानता इस दुनिया का सबसे बड़ा विरोधाभास है: जो मदद करना चाहता है वो सक्षम नहीं; और जो सक्षम है वो अपने ही बनाए हुए सिंहासन में व्यस्त है। लेकिन इस पूरी जटिलता में एक सबसे महत्वपूर्ण सीख छुपी है। आपका पहला कर्तव्य स्वयं के प्रति है। खुद को संभालें, खुद को स्थिर रखें और अपनी ऊर्जा उसी जगह प्रयोग करें जहाँ वास्तव में उसका असर पड़ता हो। दुनिया का हर बोझ आपके कंधों पर नहीं है, और हर दुःख आपकी जिम्मेदारी भी नहीं है। आप इंसान हैं कोई चमत्कारी देवता नहीं। कभी-कभी दूरी रखना भी मदद का ही एक रूप होता है, क्योंकि जब आप खुद को सुरक्षित रखते हैं, तभी आप किसी का हाथ पकड़ने की क्षमता बनाए रखते हैं। लोग आपको हमेशा अपने अनुसार ढालना चाहेंगे। कोई चाहेगा आप हमेशा उपलब्ध रहें। कोई चाहेगा आप हमेशा धैर्य रखे रहें....!!!!!

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