डर
जहाँ डर समाप्त हो जाता है, वहाँ जीवन शुरू हो जाता है यह वाक्य सुनने में सरल है किन्तु यह भीतर घटने वाले एक सूक्ष्म परिवर्तन की ओर संकेत करता है।।यहाँ डर का समाप्त होना किसी साहसिक प्रदर्शन का नाम नहीं है और जीवन का शुरू होना किसी नई परिस्थिति की घोषणा नहीं है।।यह कथन केवल चेतना की अवस्था की बात करता है।।डर किसी घटना का नाम नहीं है डर केवल भविष्य का नाम है।।जो अभी घट रहा है उससे कभी डर नहीं होता डर हमेशा उससे होता है जो अभी नहीं है पर हो सकता है।।क्या होगा लोग क्या कहेंगे मैं टिक पाऊँगा या नहीं सब हाथ से निकल गया तो डर इन्हीं प्रश्नों में जीता है।।डर का अर्थ मात्र वर्तमान से अनुपस्थिति ही है।।जहाँ व्यक्ति अभी नहीं है वहीं डर है।।डर में जीता हुआ व्यक्ति
निर्णय नहीं लेता अपितु वह केवल बचाव करता है।।वह जीवन को जीता नहीं बल्कि वह उसे संभालता है।।संबंधों में वह पूरा नहीं उतरता और कर्म में वह जोखिम से बचता है।।ऐसा जीवन चलता तो है पर बहता नहीं है।।डर समाप्त होने का अर्थ यह नहीं कि कठिनाइयाँ समाप्त हो जाती हैं।।डर समाप्त होने का अर्थ है भविष्य से पहचान समाप्त हो जाना जिसके कारण अब मन बार-बार यह नहीं पूछता अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा।।अब भीतर यह स्पष्टता होती है जो होगा उसे देखा जाएगा।।यह लापरवाही नहीं है यह भीतरी स्थिरता है।।यह भरोसा
किसी व्यक्ति में नहीं या किसी व्यवस्था में नहीं होता अपितु यह भरोसा अपने देखने की स्पष्टता में होता है।।जहाँ डर समाप्त होता है वहाँ जीवन इसलिए शुरू होता है
क्योंकि जीवन जोखिम माँगता है।।प्रेम बिना जोखिम के नहीं होता और सत्य बिना जोखिम के नहीं बोला जाता।।
स्वतंत्रता भी बिना जोखिम के नहीं मिलती है।।डर के हटते ही मनुष्य पहली बार पूरा उपस्थित होता है।।अब वह सुनता है तो पूरा सुनता है।।अब वह अनुभव करता है तो बिना दूरी के करता है।।अब वह उत्तरदायी होता है तो बिना भय के ही होता है।।यहीं जीवन शुरू होता है।।डर का गहरा संबंध अहंकार से है।।मेरी छवि टूट जाएगी या मेरी पहचान चली जाएगी या मैं गलत सिद्ध हो जाऊँगा अतः जहाँ यह मैं केंद्र में रहता है वहाँ डर बना रहता है।।जैसे ही यह मैं थोड़ा ढीला पड़ता है डर अपने आप कमजोर हो जाता है जिसके कारण डर को हटाना नहीं पड़ता बल्कि डर गिर जाता है।।ध्यान में डर इसलिए नहीं टिक पाता क्योंकि ध्यान देखने की अवस्था है अतः जैसे ही उस पर दृष्टि पड़ती है उसकी जड़ कट जाती है।।ध्यान डर से लड़ता नहीं अपितु वह डर को प्रकाश में ले आता है और प्रकाश में डर टिक नहीं पाता।।डर-मुक्त जीवन न पूरी तरह सुरक्षित होता है न नियंत्रित पर फिर भी वह सच्चा होता है।।
ऐसा व्यक्ति हँसता है तो पूरा रोता है तो बिना संकोच के पूरा ही रोता है प्रेम करता है तो बिना किसी शर्त के ही और कर्म करता है तो परिणाम की पकड़ के बिना ही करता है।।वह जीवन से सौदा नहीं करता वो वह जीवन में पूरा उतर जाता है।।जहाँ डर समाप्त होता है वहाँ कोई स्वर्ग नहीं मिलता वहां कोई विशेष उपलब्धि भी नहीं होती है।।वहाँ केवल यह घटता है कि जीवन को टाला नहीं जा रहा है अब जीवन कल के लिए नहीं है बल्कि जीवन अभी यहीं है।।और यही अभी जीवन की एकमात्र सच्ची शुरुआत है।।जहाँ डर समाप्त हो जाता है वहाँ जीवन शुरू हो जाता है क्योंकि वहाँ मनुष्य पहली बार पूरी तरह उपस्थित होता है।।

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