Saturday, 31 January 2026

इस दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है.....

इस दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है  यह पंक्ति सुनने में कठोर लगती है परंतु जीवन का सबसे यथार्थ सत्य यही है।।ज्यादातर लोग इस सत्य से जीवन भर बचते रहते हैं और अंततः इसी को समझने में उनका पूरा जीवन समाप्त हो जाता है।।मनुष्य जन्म से ही किसी न किसी पर निर्भर होना सीखता है।।बचपन में माता-पिता, युवावस्था में मित्र और संबंध,और आगे चलकर परिवार, समाज या प्रतिष्ठा  हर चरण में वह किसी बाहरी आधार को अपना सहारा मान लेता है।।यही सहारे उसे यह भ्रम देते हैं कि कोई उसका है, कोई उसके साथ हमेशा रहेगा।।पर सत्य यह है कि हर व्यक्ति अपने कर्म, अपनी आवश्यकता औरअपनी सीमाओं के अनुसार ही साथ निभाता है।।जब वह ताना बाना  टूटता है तो साथ भी समाप्त हो जाता है।।इस सत्य से मुंह मोड़ना अज्ञान है क्योंकि यह मनुष्य को सच्चाई से दूर रखता है।।वह संबंधों को उनकी प्रकृति के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी अपेक्षाओं के अनुसार देखने लगता है और  यहीं से पीड़ा जन्म लेती है।।जब व्यक्ति यह मान लेता है कि कोई उसका है, तो वह अपने सुख-दुख अपने निर्णय और अपनी मानसिक स्थिरता दूसरों के हाथों में सौंप देता है फिर जब वही लोग बदलते हैं दूर होते हैं या आवश्यकता के समय साथ नहीं देते तो उसे  अन्याय और अकेलापन अनुभव होता है।।वास्तव में लोग नहीं बदलते, बदलती है हमारी धारणा क्योंकि हम दूसरों को वह भूमिका दे देते हैं जिसे निभाने का वचन उन्होंने कभी दिया ही नहीं था।। कोई मित्र हमेशा के लिए नहीं होता और कोई संबंध स्थायी नहीं होता और कोई साथ सदा के लिए  नहीं होता है।।यह कहना निष्ठुरता नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक नियम है कि  हर व्यक्ति अंततः अपने लिए ही जीता है, चाहे वह इसे स्वीकार करे या न करे।।इस सत्य को स्वीकार कर लेना ही मुक्ति की प्रथम सीढ़ी है।। स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य संबंधों से दूर हो जाए या कठोर बन जाए अपितु इसका अर्थ केवल इतना है कि वह संबंधों को यथार्थ रूप में देखे, भ्रम में नहीं और जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि कोई उसका नहीं है तब वह किसी से अपेक्षा नहीं करता और जहाँ अपेक्षा नहीं होती, वहाँ पीड़ा भी नहीं होती है।।
इस स्वीकार के बाद व्यक्ति का व्यवहार बदलता है वह प्रेम करता है, पर अधिकार नहीं जमाता है वह संबंध निभाता है, पर आत्मसमर्पण नहीं करता है वह सहायता करता है पर बदले की आशा नहीं रखता है क्योंकि अब वह जानता है कि अंततः उसे स्वयं के साथ ही खड़ा रहना है।।जीवन का सबसे बड़ा बोझ अपेक्षाएँ होती हैं और ये अपेक्षाएँ इसी भ्रम से जन्म लेती हैं कि कोई हमारा है जैसे ही यह भ्रम टूटता है जीवन हल्का होने लगता है।।व्यक्ति भीतर से स्वतंत्र होता है जिसके कारण वह अकेला नहीं होता अपितु आत्मनिर्भर होता है।।इस सत्य को समझने में लोगों का पूरा जीवन इसलिए निकल जाता है क्योंकि यह सत्य अहंकार को चोट पहुँचाता है और मन यह मानना नहीं चाहता कि वह अकेला है कि उसे स्वयं ही अपने जीवन का भार उठाना है।। वह हमेशा किसी बाहरी सहारे की तलाश करता है।। पर जीवन बार-बार यह दिखा देता है कि अंतिम क्षणों में न कोई साथ आता है न कोई भार बाँट पाता है।।जो इस सत्य को जीवन रहते समझ लेता है, वही वास्तव में मुक्त होने की प्रथम सीढ़ी चढ़ पाता है उसकी प्रसन्नता किसी पर निर्भर नहीं रहतीउसका दुख किसी के व्यवहार से नियंत्रित नहीं होता  वह लोगों के साथ रहता है पर लोगों में खोता नहीं है यही आंतरिक स्वतंत्रता ही वास्तव में  मुक्ति की शुरुआत है।।इसलिए यह कहना कि इस दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है निराशा नहीं है अपितु यह सत्य है और इस सत्य  को स्वीकार कर लेना ही जीवन को सरल, स्थिर और मुक्त बना देता है।।

मेरा ध्येय उद्देश्य और कार्य यही है और मैं किसी और के लिए नहीं अपितु स्वयं के उद्देश्य की पूर्ति हेतु लिखता हूं।।शेष सब भगवान शिव के अधीन है और सब कुछ वही जानते हैं।।

डॉ सुशील कश्यप 

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