ईश्वर का जन्म विविध कलाओं के साथ होता है परन्तु पुरुष की उत्पत्ति पञ्च कलाओं के साथ होती है :-
🌹ईश्वर का जन्म विविध कलाओं के साथ होता है परन्तु पुरुष की उत्पत्ति पञ्च कलाओं के साथ होती है :-
१)आनन्द
२)विज्ञान
३)मन
४)प्राण
५)वाक्
शरीर अन्नमय कोष है और आत्मा आनंदमय कोष है |
जब प्राण और अन्नमय कोष मिलता है तो चित्त की सात अवस्थाएं पैदा होती हैं | प्राणमय कोष के साथ शुक्र फिर क्रमशः मज्जा, अस्थि, मेदा, स्नायु, सांस, रक्त, रस, त्वचा और लोम रहते हैं।
वैदिक विज्ञान में अन्न से निकलने वाला जो रस है वह सोमरस (मेडिकल में अन्न पाचन के बाद ग्लूकोस बनने की प्रक्रिया) माना जाता है और यह शरीर को प्राणों से जोड़ता है | इसी अन्न से उत्पन्न सोमरस से मन पोषित होता है और चन्द्रमा का अंश होने के कारण दिव्य होता है। इस प्रकार इस मन का पोषण और आत्मा के साथ मन का जुड़ाव दोनों इसी पोषक अन्न से जुडा है |
गर्भ में आत्मा रूप जब स्थूल शरीर धारण की प्रक्रिया में होता है तब 28 दिन में स्त्री रज चन्द्रमा की 28 सोम कलाओं जैसे ही पिंड भाव में परिपक्व होता है | एक वर्ष में ३६० दिनों में इस प्रकार की १३ चंद्र्मासों में १३ पिंड भाव बनते हैं | और यही कारण है की मरणोपरांत पिंडदान में १३ मासिक पिंड दिए जाते हैं २ अर्धवार्षिक एवं एक वार्षिक पिंड दान दिया जाता है | इस प्रकार एक संवत्सर में कुल १६ पिंडदान दिए जाते हैं| मासिक पिण्ड के आने पर उससे पूर्व के पिण्ड क्षीण होते रहते हैं।
इस प्रकार पिंडदान से पितर का सूक्ष्म शरीर १६ पिंड भावों से सदैव सम्पन्न रहता है | शुक्राणु में इस पिण्डरस का पतन भाव रहता है। शुक्राणु का प्रभाव पत्य और अपत्य भाव में परिलक्षित होता है | शरीर के शोणितमय अग्नि में (मासिक धर्म में) आहुत होने वाला यह सोममय शुक्र अष्टम सन्तान तक, पुत्र भाव में, अपत्य कहा जाता है। पितरों को समर्पित पिंड हमारे पितरों को वर्ष भर 28 कलायुक्त सूक्ष्म शरीर को उर्जा देते रहते हैं | पितृपक्ष में वार्षिक पिंडदान के माध्यम से पितरों को पुन: प्राप्त हो जाने के कारण उनके पिण्ड पतन की क्षतिपूर्ति हो जाती है।
28 कलाओं युक्त पितरों के पिंड भाव हमारे शरीर में शुक्रभाव (पुरुष) या रजभाव(स्त्री) में सदैव उपस्थित भी रहते हैं | हमारे शाश्त्रों में कहा गया है “आत्मा वै जायते पुत्र:। अर्थात हमारा आत्म तत्व ही पुत्र रूप में जन्म लेता है | और हमारे आत्म तत्व के सूक्ष्म शरीर में हमारे पूर्वजों के पिंड भाव भी मौजूद रहते हैं |
चन्द्रमास का 28 कला का पिण्ड रूप तेज शोणितमय अग्नि (मासिक धर्म) में पहुंचकर पितृस्तोम यज्ञ के द्वारा सन्तान रूप में विस्तृत होता है। यह पितृ पिण्ड रूप ये आत्मा ही स्त्री के शोणित अग्नि में सोम का सेवन करता है। और पुरुष पक्ष में पितृ पिंड दो भागों में विभाजित होता है एक स्वयं पुरुष भाव में और दूसरा उसके शुक्र भाव में |
किसी व्यक्ति के स्वयं में समाये पितृ पिंड की 28 कलाओं में 7 कला (1/4) स्वयं में उपस्थित होती है | इन सात प्राणों के बाद शेष 21 भाग पुत्रों के होते हैं। इसमें जितना रस पुत्र शरीर में रहता है, पितृस्तोम यज्ञ के आवपन क्रम में उसके भी दो भाग हो जाते हैं। इसमें 21 कला के अपने पिण्डरस का 6 कला (3½ अंश) वाला भाग पिता का, शेष 15 कला उसके पुत्रों के अंश होते हैं। पौत्र शरीर पैदा करने को यह दूसरा आवाप है।आगे इन 15 कला रस के भी दो भाग हो जाते हैं। पिता के पांच अंश (तृतीय भाग), शेष दस कला पुत्रों की प्रपौत्र के शरीर निर्माण के लिए होती है। यह तीसरा आवपन है। अगले आवपन क्रम में दस कला वाले पिण्डरस के दो भाग हो जाते हैं। अढ़ाई (2½ अंश) रूप चार कला पिता में रहती है। शेष 6 कला उसके पुत्रों में जाती है। वे वृद्ध प्रपौत्र के शरीर का निर्माण करती हैं। यह चौथा आवपन है।
वृद्ध प्रपौत्र की छह कलांश के भी दो भाग हो जाते हैं। तीन कला (द्वितीयांश) रूप पिता होता है। शेष तीन कला अतिवृद्ध प्रपौत्र का निर्माण करती है। यह पांचवां आवपन होता है। अन्त में तीन कला पुत्रांश के भी दो भाग होते हैं। दो कला वाला पिता तथा एक कला पुत्र के लिए। यह अंश वृद्ध से भी अतिवृद्ध प्रपौत्र के शरीर का निर्माण करने में उपयोग होती है। यह छठा आवपन है। इसके आगे शेष एक कला के भाग नहीं होते। यह एक कला पितृभाग रूप ही निकल जाती है। आगे पुत्र भाग में कोई कलांश नहीं रहता। सप्तम आवपन पर पिण्ड का सन्तान भाव समाप्त हो जाता है।
इस प्रकार पुरूष की यह महान आत्मा 84 कलाओं से सम्पन्न होता है। इनमें 56 कला पितरों की होती है तथा 28 उसकी स्वयं की होती है। आधुनिक विज्ञान इसी 28 कलाओं को गुण सूत्र का नाम से दुनिया को समझती है |
अत: इस प्रकार पितरों के अंश को प्राप्त करके जन्म ग्रहण करने वाला पुरूष सात जन्म के काल क्रम तक पितरों का ऋणी होता है। जैसा कि तैतरीय ब्राह्मण मे कहा गया है-
“एष वै जायमानस्त्रभिर्ऋण्वान्
जायते ब्रह्मचय्र्येण ऋषिभ्यो,
यज्ञेन देवेभ्य:, प्रजया पितृभ्य:।
एष वा अनृणी य: पुत्री यज्वा ब्रह्मचारी च।”
(तैत्तरीय संहिता) |
इस तरह इस धरती पर जन्म लेने वाला हर जातक पितृऋण के साथ पैदा होता है |
यज्ञ से देवताओं का तथा प्रजा रूप सन्तान क्रम से पितरों के ऋण का प्रत्यर्पण होता है। जो पुत्रवान् हो, यज्ञ करने वाला हो तथा ब्रह्मचर्य पालन करता हुआ वेदों के अध्ययन में रत हो, वही अनृणी (उऋण) माना जाता है।
स्मृति में वर्णन है की पूर्व की सात पीढ़ियों में पिता-पितामह-प्रपितामह ये तीन पीढियां पितर पिंड की भागी होती हैं और आदि चार पूर्व पितर लेपमात्र के ग्राही होते हैं |
प्रत्येक पुरूष में ये 84 कला नित्य विराजमान होती है जबकि 5 कलाएं प्रभावी रहती है। इन 84 कलाओं में से 28 स्वयं की उपार्जित ( विज्ञानं में गुणसूत्र) , 56 कला छह पितरों द्वारा प्रदत्त अग्रिम सर्जन क्रिया की होती है। उनमें पिता से 21 कला, पितामह से 15, प्रपितामह से 10, वृद्ध प्रपितामह से 6, अति वृद्ध पितामह से 3 और वृद्धातिवृद्ध पितामह से एक कला प्राप्त होती है। इनमें पिता, पितामह, प्रपितामह की जो 21,15,10 कला होती हैं, उनमें पदार्थो की अधिकता के कारण पिण्ड शब्द का प्रयोग होता है। आगे अल्पता के कारण लेप आता है।
उपरोक्त के समर्थन में विज्ञान भी कहता है की किसी संतान के जन्म में तीन पीढ़ी के माता-पिता पक्ष के कोई भी गुण प्रभावी होने के 90% सम्भावना होती है | बाकि 10 प्रतिशत उपर के 4 पीढ़ियों की हो सकती है |
इसी से 84 चन्द्र रसमयी यश नामक कला नित्य आत्मा में स्थित रहती है। इनको “उक्थ” कला कहते हैं। इनमें प्रथम छह धन भाग तो पितृ सम्बन्धी होते हैं। सातवां एक स्वयं का। ये ही सात ग्रह हैं। यही महान आत्मा का स्वरूप है।
यह महान आत्मा 28 कला युक्त होता है। शेष 56 कला युक्त पुत्र (तन्य) होता है। वहां भी 21 कला रूप उसकी सम्पत्ति होती है। शेष 35 कला से पांच पितृ सम्बन्धी धन माने जाते हैं। ये सब सन्तान के लिए होते हैं। अत: सन्तान उत्पत्ति के द्वारा उनसे ऋण मुक्त होना चाहिए।

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