Wednesday, 10 December 2025

शास्त्रों पर शोध परक विचार,

 अब तो शास्त्र ही कम लोग पढ़ते हैं और यदि पढ़ते भी हैं तो किसी पूर्व स्थापित मत पर ही स्थिर रहते हैं। शोध परक विचारों की संख्या अत्यन्त न्यून हैं। 


शास्त्रों पर शोध परक विचार, अनुसन्धान आदि प्रारम्भ से ही होते आये हैं, इन्हीं के कारण आज बहुत सी स्थापित मान्यताएँ स्थिर हुई हैं।


षड्दर्शन आदि तो प्रसिद्ध ही हैं, मध्य कालीन भारत के महान दार्शनिकों ने तब के प्रचलित सिद्धांतों को स्वीकार करते हुए, उनके आधार पर शास्त्रों में सामंजस्य स्थापित करते हुए एक मत की स्थापना की और परवर्ती युग में जैसे ही उन्हें यह प्रतीत हुआ कि इसमें परिष्कार की आवश्यकता है, वैसे ही उनमें परिष्कार करते हुए अन्य परिष्कृत सिद्धांतों के प्रतिपादन में भी संकोच नहीं किया।


इसी क्रम में न्याय शास्त्र में एक मनोरंजक प्रश्नोत्तर प्राप्त होता है जिसमें तब के प्रचलित मत के अनुसार एक अस्पष्ट समाधान निकाल लिया गया था और कालान्तर में इनमें ही परिष्कार करते हुए परिष्कृत समाधान भी निकला।


न्याय कन्दली के अनुसार प्रश्नोत्तर इस प्रकार है :---

यद् गच्छति तत् सन्निहितव्यवहितार्थौ क्रमेण प्राप्नोति।

तत्कथं शाखा चन्द्रमसोस्तुल्यकालोपलब्धिः।


अर्थात् यदि आँखों से किरणें निकलकर बाह्य वस्तु के साथ संयुक्त होकर चाक्षुष प्रत्यक्ष को सिद्ध करती हैं, तो वृक्ष की शाखा तथा चन्द्रमा इन दोनों की युगपत् अथवा एक साथ उपलब्धि किस प्रकार सम्भव होती है। क्योंकि आँखों की किरणों का शाखा की अपेक्षा चन्द्रमा तक जाने में कुछ अधिक समय अवश्य लगेगा। ऐसी दशा में शाखा दर्शन से कुछ समय पश्चात् चन्द्रमा दिखाई पड़ना चाहिये। फिर भी वह शाखा दर्शन के साथ ही किस प्रकार दिखाई पड़ता है।


इसका समाधान न्याय कन्दली ने यह दिया गया कि :--

इन्द्रियवृत्तेराशुसञ्चारित्वात् पलाशशतव्यतिभेदवत् क्रमाग्रहणनिमित्तोऽयं भ्रमो, न तु वास्तवं यौगपद्यम्।


अर्थात् वास्तव में तो शाखा के पश्चात् ही चन्द्रमा दिखाई पड़ता है। पर यह कार्य इतनी तीव्रता से होता है कि हमें क्रमिकता का बोध न होकर युगपत् अर्थात् एक साथ प्रतीति होती है। जिस प्रकार यदि सौ कमल के पत्तों में सुई से छेद किया जाय तो स्पष्टतः गणित के तर्क के अनुसार एक के पश्चात् अन्य में क्रम से ही छेद बनेगा। पर तीव्रता के कारण हमें ऐसा लगता है कि सभी पत्तों में एक साथ छेद हो गया है। इसी प्रकार यहाँ भी शाखा-चन्द्र दर्शन क्रमिक होकर भी युगपत् प्रतीत होता है।


न्याय शास्त्र में तीव्रता को प्रकट करने के लिये यह ‘कमल के पत्ते का दृष्टान्त’ इतना प्रसिद्ध हुआ कि इसने बाद में न्याय का रूप ही ले लिया। तत्त्व चिन्तामणि, प्रत्यक्षखण्ड पर मथुरानाथ टीका में इसे 'शतपत्र-भेद न्याय’ बताते हुये निरूपित किया है।


उपर्युपरिस्थितशतसंख्यकपत्राणां सूच्या युगपद् भेद-भ्रमविषयाणामपि वस्तुत: एकभेदानन्तरमपरमेदः।

--- तत्त्वचिन्तामणि पर मथुरानाथ टीका।

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