ब्राह्मण होना गर्व नहीं — तप है।
“ब्राह्मण – जाति नहीं , जिम्मेदारी है...!!"
“जिस समाज में ब्राह्मण अपनी भूमिका भूल जाए, वहाँ धर्म गूंगा हो जाता है, न्याय अंधा और शक्ति पागल!”
ब्राह्मण कौन है...??
क्या वह जो सिर्फ यज्ञ करता है?
या वह जो जनेऊ पहन कर बैठा है?
नहीं!
ब्राह्मण वह है — जो समाज की आत्मा में ज्ञान की मशाल जलाता है।
वह जो अपने भीतर के अंधकार को पहले जलाता है,
ताकि पूरी दुनिया रोशनी देख सके।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्, बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः, पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥
(ऋग्वेद – पुरुषसूक्त)
वेद कहता है – ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ।
मुख — जो बोलता है, जो मार्ग दिखाता है।
ब्राह्मण समाज का दृष्टा है, चिंतक है, मार्गदर्शक है।
लेकिन आज ब्राह्मण को खुद नहीं पता कि उसका अर्थ क्या है!
ब्राह्मण कुर्सियों की राजनीति में खो गया,
डिग्रियों में उलझ गया,
और आत्मज्ञान की साधना भूल बैठा।
“न द्विजः कर्मणा ब्राह्मणः – ज्ञानत एव ब्राह्मणः।”
(मनुस्मृति)
ब्राह्मण जन्म से नहीं , कर्म और ज्ञान से होता है।
वह जो लोभ को जीत चुका हो,
वह जो सत्य को जीवन बना चुका हो,
वही सच्चा ब्राह्मण है।
ब्राह्मण वह है —
जो राजा को धर्म सिखाता है,
सेना को विवेक सिखाता है,
जनता को संयम सिखाता है,
और स्वयं को मौन में साधता है।
“शमः दमः तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥”
(भगवद्गीता 18.42)
गीता कहती है — ब्राह्मण के गुण हैं:
शांति, इन्द्रियों का संयम, तपस्या, पवित्रता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और श्रद्धा।
यह कोई विशेषाधिकार नहीं — यह दायित्व है।
ब्राह्मण का कर्तव्य है —
जहाँ असत्य हो, वहाँ शब्द बने।
जहाँ अंधकार हो, वहाँ दीप बने।
जहाँ अधर्म हो, वहाँ ज्वाला बने।
“न ब्राह्मणोऽभ्यसूयेत् — ब्राह्मणो हि देवता: पृथिव्याः।”
(शतपथ ब्राह्मण 1.1.2.6)
ब्राह्मण को तुच्छ मत समझो — वह समाज की आत्मा है यदि निर्मल है तो...
तो हे मन कर्म वचन से ब्राह्मण!
जागो — अपने असली स्वरूप को पहचानो।
जागो — केवल ग्रंथ मत पढ़ो, जीवन को वेद बनाओ।
तुम्हारा मौन तप है,
तुम्हारा वाणी वेद है,
और तुम्हारा आचरण ही आदर्श है।
ब्राह्मण होना गर्व नहीं — तप है।
और इस तप का परिणाम है – जगत का कल्याण....

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