Thursday, 1 January 2026

सकाम निष्काम कर्म

कर्ममार्ग के अनुसार प्रत्येक वस्तु में ईश्वर की उपस्थिति को मानते हुए श्रृध्दा पूर्वक व्यवहार करना एवं निष्काम भाव से अपना कर्म करना बतलाया गया है।अपने इष्ट को निष्काम भाव से आत्मसर्मपण कर देना भक्तिमार्ग है। मनुष्य किसी भी मार्ग को अपनाए परंतु सबका आदि और अंत एक ही होता है चाहे कोई भी मार्ग हो या कोई भी धर्म हो सबको एक ही जगह ईश्वर तक पहुंचना होता है।

सकाम साधनाओं का विज्ञान निष्काम साधना से कुछ भिन्न होता है जिसके अनुसार ईश्वर सृष्टि का संचालन तीन शक्तियों द्वारा करता है इन्हें बह्मा, विष्णु एवं शिव कहते हैं इनमें ब्रह्मा का कार्य पैदा करना, विष्णु का पालन करना एवं शिव का कार्य अंत करना है प्रत्येक की लाखों शाखाएं हैं, धर्म ग्रन्थों में सात्विक, राजसिक एवं तामसिक शक्तियों को मिलाकर इन्की संख्या 33 करोड बताई गई है जिसे देवता एवं राक्षस कहते हैं एक देवता एवं राक्षस का एक विषेश गुण होता है, मनुष्य में ये सभी गुण मौजूद होते हैं हम जिस देवता की उपासना करते हैं उससे संवंधित गुणों की वृध्दि हमारे शरीर में होने लगती है परंतु इन साधनाओं में भी ध्यान की स्थिरता आवश्यक होती है बिना ध्यान में सिध्दि प्राप्त किए कोई व्यक्ति इनसे किसी प्रकार का लाभ नहीं ले सकता। ये साधनाएं सात्विक, राजसिक एवं तामसिक होतीं हैं ये मंत्र, यंत्र, तंत्र, एवं योगिक क्रियाओं द्वारा की जातीं हैं प्रत्येक साधना के साथ कर्मकांड हवन पूजन आदि जुडे रहते हैं कर्मकांड का प्रभाव प्रकृति पर होता है ये साधना के लिए अनुकूल वातावरण निर्मित करते हैं। यौगिक क्रियाओं का अभ्यास कर कुछ साधुभेषधारी लोग चमत्कार दिखाकर लोगों को प्रवाहित करते एवं ठगते हैं इन चमत्कारों का ईश्वर से कोई लेना देना नहीं होता न ही इनमें किसी प्रकार की ईश्वरीय शक्ति होती है।
धर्म के विज्ञान को समझे बिना धर्म का अनुसरण करना अंधविश्वास कहलाता है, जो कि एक मानसिक बीमारी है जिसे चिकित्सा विज्ञान की भाषा में धार्मिक पागलपन कहते हैं, जिसका प्रभाव आज सांप्रदायिक झगडों के रूप में सभी देख रहे हैं। अच्छे पढे लिखे एवं उच्च वर्ग के व्यक्त्ति भी इस बीमारी से ग्रस्त होते हैं। सभी धार्मिक कर्मों का व्यवहार सूक्ष्म जगत् में होता है अतः इनमें कर्म के साथ मानसिक भावनाओं का ही महत्व होता है इसके लिए ज्ञानेन्द्रियों को अंतर्मुखी बनाना आवश्यक है। 

मनुष्य की स्थूल जगत् में आसक्त्ति मनुष्य को काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह रूपी पांच बंधनों में बांधती है, मनुष्य के मन में हमेशा इन पांच बंधनों से संबंधित विचार ही उत्पन्न होते रहते हैं इनमें मनुष्य की जितनी आसक्त्ति बढती है उतना ही अधिक वह दुःखी होता जाता है। इन पांच बंधनों को तोड देने अर्थात् इन पर विजय प्राप्त कर लेने से ही ईश्वर से साक्षात्कार करने का रास्ता प्राप्त होता है इन बंधनों को तोडने के लिए प्रत्येक धर्म में सैकडों तरीके बताए गए हैं।हमारे देश में रोज हजारों ज्ञानी धर्म पर प्रवचन करते हैं धार्मिक साहित्य की लाखों किताबें उपलब्ध है, लोग हमेशा प्रवचन सुनते है, धार्मिक पुस्तकें भी पढते हैं एवं समझते भी है तथा दूसरों से इस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा करते है परंतु स्वयं इसका अनुसरण नहीं कर पाते क्योंकि इसके लिए लंबे समय तक कठिन अभ्यास की आवश्यकता होती है। आज इस युग में मनुष्य धन को ही सुख का साधन समझता है, क्योंकि आत्मनिर्भरता बिल्कुल समाप्त हो चुकी है, मनुष्य आज छोटी से छोटी चीज के लिए दूसरे पर निर्भर है, मनुष्य की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर पूंजीपति मनुष्य के श्रम का लगभग 80 प्रतिशत् भाग ले लेते है। धन से मनुष्य भौतिक सुख प्राप्त कर सकता है परंतु उसे मानसिक आध्यात्मिक सुख प्राप्त नहीं हो सकता, मानसिक सुख प्राप्त करने के लिए स्थूल जगत् में आसक्ति को समाप्त कर सूक्ष्म जगत् में बढाना होता है। जो मनुष्य एक बार आध्यात्मिक सुख का अनुभव कर लेता है उसके लिए भौतिक सुख किसी काम का नहीं होता, परंतु आज स्थूल जगत् में आसक्त्त मनुष्य यदि ईश्वर का नाम भी लेता है तो उसमें भी उसका स्वार्थ छिपा होता है, जबकि स्वार्थ का इस क्षेत्र से कोइ संबंध नहीं है।

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