Friday, 2 January 2026

मानवीय जीवन और आकांक्षा

कितना भी कर लीजिए, कहीं न कहीं कुछ न कुछ अधूरा रह ही जाता है। मन की पूरी निष्ठा, समय की पूरी ईमानदारी और श्रम की पूरी क्षमता लगा देने के बाद भी जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कोई एक कोना खाली दिख ही जाता है। ये खालीपन कभी हमारे भीतर की अपेक्षाओं से जन्म लेता है, तो कभी दूसरों की निगाहों से। और अक्सर वही खाली कोना सबसे पहले दिखाया भी जाता है। लोग पूरे प्रयास को नहीं देखते, वे उस छोटी-सी दरार को देखते हैं जहाँ से सवाल उठाया जा सके। ये स्वभाव शायद मनुष्य का ही है, पूरे दीपक की रौशनी छोड़कर उसके नीचे की छाया गिन लेना। आप जितना शांत भाव से अपने कर्तव्य निभाते हैं, उतनी ही आसानी से आपकी कमियाँ गिना दी जाती हैं, मानों वही आपकी पूरी पहचान हों। उस क्षण भीतर कुछ टूटता है, क्योंकि आपने जो दिया था, वो अनदेखा रह गया और जो नहीं दे पाए, वही आपका परिचय बन गया। कमियाँ जब गिनाई जाती हैं, तो वे केवल शब्द नहीं होतीं। वे सीधे आत्मसम्मान से टकराती हैं। सुनते हुए मन खुद से सवाल करता है क्या सच में मेरा प्रयास इतना कम था? क्या मेरी नीयत में कोई खोट रह गई? और यहीं से अफसोस जन्म लेता है। अफसोस इस बात का नहीं कि गलती हुई, बल्कि इस बात का कि पूरी ईमानदारी के बावजूद केवल गलती ही देखी गई।सबसे अधिक चोट तो तब लगती है जब कमियाँ उन लोगों की ओर से आती हैं, जिनके लिए आपने स्वयं को पीछे रखा था। जिनकी सुविधा के लिए आपने अपने समय, अपनी इच्छा और अपने सुख को टाल दिया था। तब मन में ये स्वीकार करना कठिन हो जाता है कि निस्वार्थता भी हमेशा सम्मान नहीं पाती। कई बार तो ऐसा लगता है कि जितना अधिक आप देते हैं, उतनी ही अपेक्षाएँ बढ़ती जाती हैं, और अपेक्षाओं के साथ बढ़ती जाती हैं शिकायतें। यकीन मानिए ये भी एक कड़वा सत्य है कि संसार पूर्णता को नहीं, सुविधा को सराहता है। जब तक आपकी मौजूदगी किसी के लिए सहूलियत बनी रहती है, आप अच्छे हैं। जिस दिन आप अपेक्षा से एक कदम पीछे रह गए, उसी दिन आपकी सारी अच्छाइयाँ भुला दी जाती हैं। तब आपके वर्षों के प्रयास एक पल में हल्के पड़ जाते हैं। इन क्षणों में सबसे कठिन काम होता है स्वयं को संभालना। मन बार-बार कहता है कि शायद और कर लेना चाहिए था, शायद और सह लेना चाहिए था। लेकिन धीरे-धीरे ये समझ भी उभरती है कि इंसान होना ही अपूर्ण होना है। हर सीमा को लांघ पाना, हर अपेक्षा को पूरा कर पाना, ये किसी के लिए संभव नहीं। कमी रह जाना असफलता नहीं, मानवीय होना है.....!!!!!!

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