ध्यान
ध्यान पर लेखन का निरंतर प्रयास रहता है किंतु समय के अभाव के कारण कभी कभार ही संभव हो पाता है।।वैसे मेरी इच्छा ध्यान और ज्योतिषीय योग पर निरंतर लेखन की रहती है
मनुष्य का मन केवल वही नहीं होता जो बाहर दिखाई देता है अपितु मन के भीतर एक और गहरा भाग होता है जिसे अवचेतन मन कहते हैं।।इस अवचेतन मन में पुराने दुख डर, यादें इच्छाएँ और संस्कार छिपे रहते हैं।। ये दिखाई नहीं देते लेकिन धीरे धीरे हमारे जीवन को चलाते रहते हैं।।कई बार व्यक्ति बिना कारण डर जाता है।।कभी छोटी बात पर बहुत क्रोध आ जाता है और कभी मन अचानक बेचैन हो जाता है।।व्यक्ति सोचता है कि ऐसा क्यों हो रहा है किंतु वास्तव में यह सब भीतर दबे हुए भावों का असर होता है।।जब व्यक्ति ध्यान करना शुरू करता है तब उसे लगता है कि मन बहुत भाग रहा है।।बहुत सारे विचार आने लगते हैं लेकिन सच यह है कि विचार बढ़ते नहीं हैं।।ध्यान में पहली बार व्यक्ति अपने मन को साफ साफ देखना शुरू करता है।।धीरे धीरे ध्यान करने से मन के भीतर छिपी बातें बाहर आने लगती हैं।।पुराने दुख डर और दबे हुए भाव सामने आने लगते हैं।।इसी कारण सच्चा ध्यान केवल शांति का अनुभव नहीं है अपितु यह अपने भीतर को देखने की प्रक्रिया भी है।।बहुत लोग इसी समय ध्यान छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ध्यान से मन और खराब हो गया लेकिन वास्तव में ध्यान मन की गंदगी को बाहर ला रहा होता है।।यदि व्यक्ति धैर्य रखे तो धीरे धीरे मन हल्का होने लगता है।।
ध्यान का अर्थ विचारों को दबाना नहीं है अपितु उन्हें समझना है।।जब व्यक्ति अपने विचारों को केवल देखने लगता है तब धीरे धीरे मन शांत होने लगता है।।इसे ही साक्षी भाव कहा गया है।।साक्षी भाव का अर्थ है विचारों में बहना नहीं बल्कि उन्हें देखने वाला बनना और धीरे धीरे व्यक्ति समझने लगता है कि उसके दुख का कारण केवल बाहर की दुनिया नहीं है।।बहुत कुछ उसके भीतर जमा हुआ भी है इसलिए ध्यान संसार से भागना नहीं है अपितु ध्यान स्वयं को समझने का मार्ग है।।सच्चा ध्यान व्यक्ति को भीतर से शांत सरल और हल्का बना देता है और यही संकेत है कि ध्यान धीरे धीरे अवचेतन मन को बदल रहा है।।
डॉ सुशील कश्यप
