ध्यान तंत्र
लेख अति जटिल विषय पर होने के कारण और समय अभाव के कारण कुछ त्रुटि होने की कुछ संभावना है।।त्रुटि को अलग हटाकर विषय को समझने का प्रयास करें।। ऐसे विषय नितांत समय और स्थिरता की जरूरत होती है जबकि अभी छः दिनों की अंडमान भ्रमण कर कल संध्या काल में दिल्ली पहुंचा, इस भ्रमण से न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक थकावट अपनी चरम पर है फिर भी कई जिज्ञासु ने इतने अधिक संदेश भेज दिए कि अभी ही लिखना पड़ा।।
ध्यान का प्रयास नहीं करना पड़ता है क्योंकि वास्तविक ध्यान किया नहीं जाता वह स्वतः अर्थात अपने आप घटित होता है।।जब मन निरंतर इच्छाओं चिंताओं और विचारों के अनवरत प्रवाह से थक जाता है तब भीतर स्वाभाविक रूप से एक विराम उत्पन्न होने लगता है।।यही विराम धीरे-धीरे मौन में बदलता है और उसी मौन में ध्यान की अवस्था जन्म लेती है।।इसलिए ध्यान किसी कृत्रिम अभ्यास का परिणाम नहीं बल्कि चेतना की परिपक्वता का संकेत है।।ज्योतिषीय दृष्टि से यह अवस्था तब अधिक स्पष्ट होती है जब जन्मकुंडली में चंद्रमा केतु और गुरु का गहरा संबंध बनता है।।चंद्रमा मन का कारक है, गुरु ज्ञान और मार्गदर्शन का प्रतीक है और केतु वैराग्य तथा भीतर की यात्रा का प्रतिनिधि माना जाता है।।जब केतु की ऊर्जा जीवन में सक्रिय होती है तब व्यक्ति धीरे-धीरे यह अनुभव करने लगता है कि बाहरी उपलब्धियाँ मन को स्थायी शांति नहीं दे सकतीं और यही अनुभव उसे भीतर की ओर मोड़ने लगता है।।विशेष रूप से जब केतु अष्टम द्वादश या नवम भाव में स्थित होता है तब व्यक्ति के भीतर जीवन के गहरे रहस्यों को समझने की जिज्ञासा बढ़ने लगती है।। अष्टम भाव रहस्य और आत्मचिंतन से जुड़ा है।। द्वादश भाव मौन एकांत और ध्यान से संबंधित माना जाता है जबकि नवम भाव धर्म गुरु और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का भाव है।।इन भावों में केतु व्यक्ति को धीरे धीरे बाहरी आकर्षणों से हटाकर भीतर की शांति की ओर ले जाता है।।प्रथम भाव में स्थित केतु भी एक विशेष स्थिति बनाता है।।प्रथम भाव स्वयं व्यक्ति के स्वभाव पहचान और आत्मबोध का भाव है।।जब यहाँ केतु स्थित होता है तब मनुष्य को कई बार यह अनुभव होता है कि वह सामान्य भीड़ का हिस्सा होकर भी भीतर से अलग है।।उसे अपनी ही पहचान और अस्तित्व के विषय में प्रश्न उठने लगते हैं।।यही प्रश्न धीरेधीरे आत्मचिंतन और ध्यान का मार्ग खोलते हैं।।जब चंद्रमा संतुलित हो और गुरु शुभ स्थिति में मार्गदर्शन दे रहा हो तब यह वैराग्य भ्रम या पलायन नहीं बनता बल्कि समझ और विवेक में बदल जाता है।।तब मनुष्य संसार में रहते हुए भी भीतर से शांत रहने लगता है।।ऐसी अवस्था में ध्यान करने का प्रयास नहीं करना पड़ता ध्यान स्वयं उसके भीतर प्रकट होने लगता है।।
यह लेख मेरे अध्ययन और अनुभव दोनों का परिणाम है।।
सहमत और असहमत होना आपका निजी अधिकार है।। जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि तंत्र के जन्मदाता और सबसे प्रथम आचार्य स्वयं भगवान शिव हैं।।ध्यान तंत्र का अभिन्न अंग है क्योंकि ध्यान के पश्चात केवल समाधि ही शेष ............
डॉ सुशील कश्यप

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