Sunday, 1 February 2026

मानवीय प्रवृत्ति

नित्य प्राप्त हुए प्रश्नों के आधार पर लिखने का प्रयास किया है।।निश्चित ही कुछ लोग सहमत होंगे कुछ असहमत भी होंगे क्योंकि हर व्यक्ति के विचार और वृति अलग अलग होती हैं किंतु अध्ययन अवश्य कीजिए क्या पता जीवन के किसी मोड़ पर मेरी कोई बात आपके काम आ जाए।।

दुनिया में बुरी प्रवृत्ति और बुरे मनुष्य कोई नई घटना नहीं हैं वे पहले भी थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे।। अतः इतिहास उठाकर देखिए, समाज को देखिए, और अपने व्यक्तिगत जीवन को देखिए हर स्तर पर इसके उदाहरण मिल जाते हैं।। कोई धोखा देता है, कोई पीठ पीछे बुराई करता है, कोई छल करता है, कोई जानबूझकर हानि पहुँचाने का प्रयास करता है।। यह सब मनुष्य की अधूरी समझ और बिगड़ चुकी  चेतना का स्वाभाविक परिणाम है।। इस सच्चाई से मुँह मोड़ना समाधान नहीं, बल्कि इसे शांत भाव से देख पाना ही समझदारी है।।
वास्तविक समस्या यह नहीं है कि लोग बुरे क्यों हैं अपितु समस्या वहाँ से शुरू होती है जहाँ हम उनकी बुराई को अपने मन में बैठा लेते हैं  किसी ने क्या कहा, क्या किया, किस भाव से किया यह सब उसकी चेतना उसके विवेक का स्तर दर्शाता है लेकिन उसे बार-बार याद करना, उन्हीं शब्दों को मन में दोहराना, उन्हीं घटनाओं पर भीतर ही भीतर जलते रहना यह हमारी ऊर्जा और जीवन को धीरे-धीरे नष्ट करता है।। दूसरे के कर्मों का बोझ ढोते-ढोते हम स्वयं थक जाते हैं, जबकि गलती हमारी  होती ही नहीं है ।।
यह बात बहुत स्पष्ट रूप से समझने योग्य है कि सामने वाला व्यक्ति जैसा है, वह उसकी अपनी कहानी है।। वह छल करता है, धोखा देता है या द्वेष रखता है यह उसकी  स्थिति उसकी पीड़ा को दर्शाता है लेकिन हम उस स्थिति पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं, किस स्तर पर रुकते हैं या उससे ऊपर उठते हैं यह पूरी तरह हमारी जिम्मेदारी है।। यदि हम क्रोध, घृणा और बदले की भावना में उलझ जाते हैं, तो हम भी उसी स्तर पर उतर आते हैं जहाँ वह व्यक्ति खड़ा है।।सच तो यह है कि हर व्यक्ति अपनी कहानी स्वयं लिख रहा है  कोई अज्ञान से, कोई भय से, कोई असुरक्षा और लालच से पर हमारी कहानी इस बात पर निर्भर करती है कि हम क्या चुनते हैं बोझ या बोध,घृणा अथवा प्रेम।। यदि हम अपनी चेतना की रक्षा करना सीख लें, अपनी आत्मा को हल्का रखें, तो किसी दूसरे की नकारात्मकता हमें भीतर से छू भी नहीं सकतीहै।।दूरी बनाना, सीमाएँ तय करना और सजग रहना जीवन के लिए आवश्यक है लेकिन भीतर कटुता, घृणा या विष पालना आवश्यक नहीं है।। जब हम यह समझ लेते हैं कि वह बुरा है यह उसकी कहानी है, और मैं कैसा बनूँ यह मेरी कहानी है, तब जीवन में एक गहरी शांति उतरने लगती है।। यही परिपक्वता है यही हमारी जिम्मेदारी है और यही सच्ची भीतर की आजादी  का मार्ग है।।

डॉ सुशील कश्यप 

Saturday, 31 January 2026

इस दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है.....

इस दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है  यह पंक्ति सुनने में कठोर लगती है परंतु जीवन का सबसे यथार्थ सत्य यही है।।ज्यादातर लोग इस सत्य से जीवन भर बचते रहते हैं और अंततः इसी को समझने में उनका पूरा जीवन समाप्त हो जाता है।।मनुष्य जन्म से ही किसी न किसी पर निर्भर होना सीखता है।।बचपन में माता-पिता, युवावस्था में मित्र और संबंध,और आगे चलकर परिवार, समाज या प्रतिष्ठा  हर चरण में वह किसी बाहरी आधार को अपना सहारा मान लेता है।।यही सहारे उसे यह भ्रम देते हैं कि कोई उसका है, कोई उसके साथ हमेशा रहेगा।।पर सत्य यह है कि हर व्यक्ति अपने कर्म, अपनी आवश्यकता औरअपनी सीमाओं के अनुसार ही साथ निभाता है।।जब वह ताना बाना  टूटता है तो साथ भी समाप्त हो जाता है।।इस सत्य से मुंह मोड़ना अज्ञान है क्योंकि यह मनुष्य को सच्चाई से दूर रखता है।।वह संबंधों को उनकी प्रकृति के अनुसार नहीं, बल्कि अपनी अपेक्षाओं के अनुसार देखने लगता है और  यहीं से पीड़ा जन्म लेती है।।जब व्यक्ति यह मान लेता है कि कोई उसका है, तो वह अपने सुख-दुख अपने निर्णय और अपनी मानसिक स्थिरता दूसरों के हाथों में सौंप देता है फिर जब वही लोग बदलते हैं दूर होते हैं या आवश्यकता के समय साथ नहीं देते तो उसे  अन्याय और अकेलापन अनुभव होता है।।वास्तव में लोग नहीं बदलते, बदलती है हमारी धारणा क्योंकि हम दूसरों को वह भूमिका दे देते हैं जिसे निभाने का वचन उन्होंने कभी दिया ही नहीं था।। कोई मित्र हमेशा के लिए नहीं होता और कोई संबंध स्थायी नहीं होता और कोई साथ सदा के लिए  नहीं होता है।।यह कहना निष्ठुरता नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक नियम है कि  हर व्यक्ति अंततः अपने लिए ही जीता है, चाहे वह इसे स्वीकार करे या न करे।।इस सत्य को स्वीकार कर लेना ही मुक्ति की प्रथम सीढ़ी है।। स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य संबंधों से दूर हो जाए या कठोर बन जाए अपितु इसका अर्थ केवल इतना है कि वह संबंधों को यथार्थ रूप में देखे, भ्रम में नहीं और जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि कोई उसका नहीं है तब वह किसी से अपेक्षा नहीं करता और जहाँ अपेक्षा नहीं होती, वहाँ पीड़ा भी नहीं होती है।।
इस स्वीकार के बाद व्यक्ति का व्यवहार बदलता है वह प्रेम करता है, पर अधिकार नहीं जमाता है वह संबंध निभाता है, पर आत्मसमर्पण नहीं करता है वह सहायता करता है पर बदले की आशा नहीं रखता है क्योंकि अब वह जानता है कि अंततः उसे स्वयं के साथ ही खड़ा रहना है।।जीवन का सबसे बड़ा बोझ अपेक्षाएँ होती हैं और ये अपेक्षाएँ इसी भ्रम से जन्म लेती हैं कि कोई हमारा है जैसे ही यह भ्रम टूटता है जीवन हल्का होने लगता है।।व्यक्ति भीतर से स्वतंत्र होता है जिसके कारण वह अकेला नहीं होता अपितु आत्मनिर्भर होता है।।इस सत्य को समझने में लोगों का पूरा जीवन इसलिए निकल जाता है क्योंकि यह सत्य अहंकार को चोट पहुँचाता है और मन यह मानना नहीं चाहता कि वह अकेला है कि उसे स्वयं ही अपने जीवन का भार उठाना है।। वह हमेशा किसी बाहरी सहारे की तलाश करता है।। पर जीवन बार-बार यह दिखा देता है कि अंतिम क्षणों में न कोई साथ आता है न कोई भार बाँट पाता है।।जो इस सत्य को जीवन रहते समझ लेता है, वही वास्तव में मुक्त होने की प्रथम सीढ़ी चढ़ पाता है उसकी प्रसन्नता किसी पर निर्भर नहीं रहतीउसका दुख किसी के व्यवहार से नियंत्रित नहीं होता  वह लोगों के साथ रहता है पर लोगों में खोता नहीं है यही आंतरिक स्वतंत्रता ही वास्तव में  मुक्ति की शुरुआत है।।इसलिए यह कहना कि इस दुनिया में कोई किसी का नहीं होता है निराशा नहीं है अपितु यह सत्य है और इस सत्य  को स्वीकार कर लेना ही जीवन को सरल, स्थिर और मुक्त बना देता है।।

मेरा ध्येय उद्देश्य और कार्य यही है और मैं किसी और के लिए नहीं अपितु स्वयं के उद्देश्य की पूर्ति हेतु लिखता हूं।।शेष सब भगवान शिव के अधीन है और सब कुछ वही जानते हैं।।

डॉ सुशील कश्यप 

Friday, 30 January 2026

मनुष्य का मूल्य

मनुष्य का मूल्य उसके पास मौजूद जानकारी से नहीं आँका जाता अपितु उसका मूल्य इस बात से तय होता है कि वह ज्ञान के साथ कैसा व्यवहार करता है अतः  जो व्यक्ति सच में ज्ञानी होता है वह सारा जीवन स्वयं को अधूरा मानता है।। उसे यह स्पष्ट बोध होता है कि उसका अनुभव सीमित है और संसार उससे कहीं बड़ा है और इसी बोध के कारण वह सीखता है पूछता है सुनता है और धैर्यपूर्वक निष्कर्ष तक पहुँचता है।।मूर्ख व्यक्ति इसके ठीक विपरीत होता है  वह स्वयं को पूर्ण मानता है और उसे लगता है कि उसे सब पता है।। इसी भ्रम के कारण उसके भीतर सीखने की कोई आवश्यकता नहीं बचती अतः जब भीतर प्रश्न नहीं होते, तब बाहर केवल राय बचती है इसलिए वह हर विषय पर बोलता है, चाहे उसका उससे कोई संबंध अनुभव या अभ्यास न हो।।
ज्ञानी व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसका संयम है।। वह बोलने में उतना ही नियंत्रित होता है जितना सीखने में तत्पर होता है  वह जानता है कि हर विषय पर बोलना बुद्धिमानी नहीं है क्योंकि हर विषय पर जान पाना संभव ही नहीं है।।
राजनीति पर बोलने से पहले वह इतिहास और वर्तमान दोनों को समझने का प्रयास करता है।। बाजार पर राय बनाने से पहले वह आँकड़ों जोखिम और वास्तविकता को देखता है।। समाज पर टिप्पणी करने से पहले वह स्वयं को समाज से अलग नहीं मानता, बल्कि उसका अंग समझता है।। 
वह सलाह तभी देता है जब उससे माँगी जाए  और तब भी वही बात कहता है, जिसे उसने स्वयं अपने जीवन में परखा हो अतः उसकी बातों में दिखावा नहीं होता अपितु समाधान होता है।।
मूर्ख व्यक्ति का सबसे स्पष्ट लक्षण अतिआत्मविश्वास होता है अतः वह बिना जाने बिना समझे और बिना अनुभव किए ही  स्वयं को विशेषज्ञ मानता है।। बाजार क्यों गिरा उसे पता होता है राजनीति कैसे सुधरेगी, इसका हल भी उसी के पास होता है।। खेल में कौन गलत खेल रहा है यह भी वही तय करता है समाज, रिश्ते, पैसा और जीवन  हर विषय पर उसके पास राय होती है।।
लेकिन उसके जीवन में उन रायों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता अतः जो व्यक्ति धन कमाने की सलाह देता है, वह स्वयं आर्थिक अस्थिरता में जी रहा होता है  जो व्यक्ति संबंधों पर उपदेश देता है, उसके अपने रिश्ते टूटे होते हैं।। जो व्यक्ति समाज सुधार की बातें करता है उसका स्वयं का व्यवहार अव्यवस्थित होता है।।
मूर्ख व्यक्ति सीखता नहीं, क्योंकि सीखने के लिए पहले यह स्वीकार करना पड़ता है कि मुझे नहीं पता और यही उसका अहंकार यह स्वीकार कभी नहीं करता।।
आज के समय में राय देना सबसे आसान कार्य बन चुका है क्योंकि मंच हैं माध्यम है, श्रोता हैं लेकिन बोलने का अवसर मिल जाना ज्ञान का प्रमाण नहीं होता राय देना किसी श्रम की माँग नहीं करता जबकि सीखना समय धैर्य और अनुशासन माँगता है।।
मूर्ख व्यक्ति श्रम से बचता है और राय के माध्यम से स्वयं को महत्वपूर्ण अनुभव करता है उसे लगता है कि अधिक बोलने से वह अधिक बुद्धिमान सिद्ध होगा जबकि वास्तविकता यह है कि निरंतर बोलना अक्सर भीतर की रिक्तता को छिपाने का प्रयास होता है।।
ज्ञानी व्यक्ति जीवन भर सीखता है और अंत तक स्वयं को अधूरा मानता है और मूर्ख व्यक्ति जीवन भर बोलता है और स्वयं को पूर्ण समझता है ज्ञानी की पहचान उसके प्रश्नों से होती है, मूर्ख की पहचान उसके उत्तर से होती है।।
अतः जो व्यक्ति सीखना छोड़ देता है, वह धीरे-धीरे वास्तविकता से कट जाता है और जो व्यक्ति सीखता रहता है वही समय समाज और जीवन के साथ आगे बढ़ता है।।
अतः निष्कर्ष यह है कि जिज्ञासा और आत्मस्वीकृति  ये बुद्धिमत्ता के स्थायी संकेत हैं जबकि अति राय अति सलाह और अति दिखावा  केवल मूर्खता के  लक्षण हैं।।

जितना जान पाया उतना लिखने का प्रयास किया है शेष सब कुछ केवल श्री भगवान ही जानते हैं क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब श्री भगवान ही हैं।।

डॉ सुशील कश्यप 

Tuesday, 13 January 2026

डर

जहाँ डर समाप्त हो जाता है, वहाँ जीवन शुरू हो जाता है यह वाक्य सुनने में सरल है किन्तु यह भीतर घटने वाले एक सूक्ष्म परिवर्तन की ओर संकेत करता है।।यहाँ डर का समाप्त होना किसी साहसिक प्रदर्शन का नाम नहीं है और जीवन का शुरू होना किसी नई परिस्थिति की घोषणा नहीं है।।यह कथन केवल चेतना की अवस्था की बात करता है।।डर किसी घटना का नाम नहीं है डर केवल भविष्य का नाम है।।जो अभी घट रहा है उससे कभी डर नहीं होता डर हमेशा उससे होता है जो अभी नहीं है पर हो सकता है।।क्या होगा लोग क्या कहेंगे मैं टिक पाऊँगा या नहीं सब हाथ से निकल गया तो डर इन्हीं प्रश्नों में जीता है।।डर का अर्थ मात्र वर्तमान से अनुपस्थिति ही है।।जहाँ व्यक्ति अभी नहीं है वहीं डर है।।डर में जीता हुआ व्यक्ति
निर्णय नहीं लेता अपितु वह केवल बचाव करता है।।वह जीवन को जीता नहीं बल्कि वह उसे संभालता है।।संबंधों में वह पूरा नहीं उतरता और कर्म में वह जोखिम से बचता है।।ऐसा जीवन चलता तो है पर बहता नहीं है।।डर समाप्त होने का अर्थ यह नहीं कि कठिनाइयाँ समाप्त हो जाती हैं।।डर समाप्त होने का अर्थ है भविष्य से पहचान समाप्त हो जाना जिसके कारण अब मन बार-बार यह नहीं पूछता अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा।।अब भीतर यह स्पष्टता होती है जो होगा उसे देखा जाएगा।।यह लापरवाही नहीं है यह भीतरी स्थिरता है।।यह भरोसा
किसी व्यक्ति में नहीं या किसी व्यवस्था में नहीं होता अपितु यह भरोसा अपने देखने की स्पष्टता में होता है।।जहाँ डर समाप्त होता है वहाँ जीवन इसलिए शुरू होता है
क्योंकि जीवन जोखिम माँगता है।।प्रेम बिना जोखिम के नहीं होता और सत्य बिना जोखिम के नहीं बोला जाता।।
स्वतंत्रता भी  बिना जोखिम के नहीं मिलती है।।डर के हटते ही मनुष्य पहली बार पूरा उपस्थित होता है।।अब वह सुनता है तो पूरा सुनता है।।अब वह अनुभव करता है तो बिना दूरी के करता है।।अब वह उत्तरदायी होता है तो बिना भय के ही होता है।।यहीं जीवन शुरू होता है।।डर का गहरा संबंध अहंकार से है।।मेरी छवि टूट जाएगी या  मेरी पहचान चली जाएगी या मैं गलत सिद्ध हो जाऊँगा अतः जहाँ यह  मैं केंद्र में रहता है वहाँ डर बना रहता है।।जैसे ही यह मैं थोड़ा ढीला पड़ता है डर अपने आप कमजोर हो जाता है जिसके कारण डर को हटाना नहीं पड़ता बल्कि  डर गिर जाता है।।ध्यान में डर इसलिए नहीं टिक पाता क्योंकि ध्यान देखने की अवस्था है अतः जैसे ही उस पर दृष्टि पड़ती है उसकी जड़ कट जाती है।।ध्यान डर से लड़ता नहीं अपितु वह डर को प्रकाश में ले आता है और प्रकाश में डर टिक नहीं पाता।।डर-मुक्त जीवन न पूरी तरह सुरक्षित होता है न नियंत्रित पर फिर भी  वह सच्चा होता है।।
ऐसा व्यक्ति हँसता है तो पूरा रोता है तो बिना संकोच के पूरा ही रोता है प्रेम करता है तो बिना किसी शर्त के ही और कर्म करता है तो परिणाम की पकड़ के बिना ही करता है।।वह जीवन से सौदा नहीं करता वो वह जीवन में पूरा  उतर जाता है।।जहाँ डर समाप्त होता है वहाँ कोई स्वर्ग नहीं मिलता वहां कोई विशेष उपलब्धि भी नहीं होती है।।वहाँ केवल यह घटता है कि जीवन को टाला नहीं जा रहा है अब जीवन कल के लिए नहीं है बल्कि  जीवन अभी यहीं है।।और यही अभी जीवन की एकमात्र सच्ची शुरुआत है।।जहाँ डर समाप्त हो जाता है वहाँ जीवन शुरू हो जाता है क्योंकि वहाँ मनुष्य पहली बार पूरी तरह उपस्थित होता है।।

Thursday, 8 January 2026

समस्या हमारे हाथ में नहीं, पर समाधान अवश्य हमारे हाथ में है

समस्या हमारे हाथ में नहीं, पर समाधान अवश्य हमारे हाथ में है

मनुष्य के जीवन में समस्या आना कोई असामान्य बात नहीं है। समस्या का होना अक्सर हमारे नियंत्रण में नहीं होता, लेकिन उस समस्या का समाधान ढूँढना और उससे बाहर निकलना निश्चित रूप से हमारे हाथ में होता है। जीवन की यही सबसे बड़ी सच्चाई है, जिसे हम समझते तो हैं, पर स्वीकार करने में अक्सर चूक जाते हैं।

कई बार ऐसा होता है कि व्यक्ति को स्वयं यह भी पता नहीं चलता कि वह कब और कैसे किसी समस्या में फँस गया। हर समस्या व्यक्ति की अपनी गलती से उत्पन्न नहीं होती। बहुत बार परिस्थितियाँ, समाज, परिवार, कार्यस्थल या दूसरे लोगों के व्यवहार के कारण निर्दोष लोग समस्याओं के जाल में उलझ जाते हैं।

नकारात्मक प्रभाव और अनजाने निर्णय

अक्सर लोगों के जीवन में नकारात्मक सोच रखने वाले लोगों का प्रभाव बहुत गहरा होता है। ऐसे लोग स्वयं तो भ्रमित होते ही हैं, साथ ही दूसरों के जीवन में भी अस्थिरता भर देते हैं। व्यक्ति समस्या नहीं चाहता, पर अनजाने में ऐसे निर्णय ले लेता है जो समस्या को उसके घर, उसके मन और उसके जीवन में प्रवेश करा देते हैं।

नौकरी में असंतोष, परिवार में कलह, व्यापार में घाटा, शरीर से जुड़ी परेशानियाँ और नकारात्मक सोच ये सभी समस्याएँ धीरे-धीरे जन्म लेती हैं। शुरुआत में वे बहुत छोटी लगती हैं, लेकिन समय के साथ वे विशाल रूप ले लेती हैं।

दूसरों की सलाह और अनुभव का भ्रम

कई बार लोग दूसरों की बातों में आकर समस्याओं में फँस जाते हैं, चाहे सामने वाला व्यक्ति कितना ही विद्वान या अनुभवी क्यों न हो। इसका कारण यह है कि हर मनुष्य का अनुभव, सोचने का तरीका और परिस्थितियाँ अलग होती हैं।

जब कोई व्यक्ति अपनी पारिवारिक, आर्थिक या मानसिक समस्या लेकर किसी ज्ञानी या सलाहकार के पास जाता है, तो वह सलाहकार अपने अनुभव के आधार पर समाधान सुझाता है। वह समाधान कई बार सही भी हो सकता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वह समाधान उस व्यक्ति की परिस्थिति के अनुकूल हो।

मान लीजिए किसी को पारिवारिक या आर्थिक समस्या है। वह किसी विद्वान के पास जाता है, अपनी समस्या बताता है और विद्वान उसे एक निश्चित रास्ते पर चलने की सलाह देता है। व्यक्ति पूरी ईमानदारी से उस रास्ते पर चलता भी है, लेकिन फिर भी समस्या का समाधान नहीं होता। इसका कारण यह है कि समाधान व्यक्ति विशेष के मन, परिस्थिति और सोच के अनुसार नहीं था।

बचपन की स्मृतियाँ और अवचेतन मन

कई समस्याओं की जड़ बचपन में छिपी होती है। हमारे देश में आज भी मानसिक स्वास्थ्य को बहुत सतही दृष्टि से देखा जाता है। हाल के वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा बढ़ी है, लेकिन यह जागरूकता अधिकतर शहरों तक ही सीमित है। गाँवों में आज भी बच्चों की परवरिश डंडे और डर के सहारे की जाती है पढ़ाई के लिए डंडा, खाने के लिए डंडा, खेलने पर डंडा।

बचपन में घटित कई दुःखद घटनाएँ बच्चे के अवचेतन मन में गहरे बैठ जाती हैं। बच्चा बड़ा होकर उन घटनाओं को भूल जाता है, लेकिन वे स्मृतियाँ मन के किसी कोने में जीवित रहती हैं। आगे चलकर वही दबा हुआ डर, असुरक्षा या पीड़ा समस्या के रूप में सामने आती है। व्यक्ति को समझ ही नहीं आता कि समस्या की जड़ कहाँ है, क्योंकि उसे स्वयं उस घटना की कोई स्पष्ट स्मृति नहीं होती।

समस्या का समाधान कोई जादू नहीं

आज के समय में लोग त्वरित समाधान चाहते हैं एक सलाह, एक उपाय, एक मंत्र और समस्या समाप्त। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। समस्या का समाधान कोई जादू नहीं है कि आपने कहा और किसी ने एक टिप्स दे दी और सब ठीक हो गया।

जब लोग मुझसे फोन या संदेश के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान पूछते हैं, तो मैं उनसे यही कहता हूँ जब तक मैं आपकी समस्या को पूरी तरह समझ नहीं लेता, तब तक कोई समाधान नहीं बता सकता। समस्या को समझने के लिए संपूर्ण ध्यान, समय और ईमानदारी की आवश्यकता होती है।

आप किसी भी विद्वान, गुरु या सलाहकार के पास जाएँ, वह आपको दिशा दिखा सकता है, रास्ता बता सकता है, लेकिन उस रास्ते पर चलना आपको ही पड़ेगा। समाधान बाहर से नहीं आता, वह भीतर से निकलता है।

स्वयं का समाधान स्वयं

प्रकृति का यही नियम है हर व्यक्ति को अपनी समस्या का समाधान स्वयं करना होता है। कोई और आपकी जगह उस संघर्ष को नहीं जी सकता, न ही आपकी जगह निर्णय ले सकता है। जब व्यक्ति अपनी समस्या को गहराई से समझता है, अपने मन को सुनता है और अपने अनुभव से सीखता है, तभी वास्तविक समाधान जन्म लेता है।

समस्या से भागना नहीं, उसे समझना ही समाधान की पहली सीढ़ी है। और जब व्यक्ति यह स्वीकार कर लेता है कि समाधान उसके अपने हाथ में है, तभी वह सशक्त बनता है।

क्योंकि समस्या आना जीवन का हिस्सा है,
पर समाधान ढूँढना जीवन को दिशा देना है।

कल सिर्फ एक कल्पना है जो कभी आता नहीं...

 आपने कभी इस पर ध्यान दिया है कि मनुष्य पूरा जीवन जीने की तैयारी में ही लगा रहता है, पर स्वयं जीता कभी नहीं है।। वह हर समय किसी आने वाले कल की प्रतीक्षा करता है।। उसे लगता है कि आज नहीं, कल जीवन शुरू होगा।। अभी तो बस तैयारी चल रही है।।

कोई कहता है जब पैसा हो जाएगा तब जी लूँगा।। कोई कहता है जब घर बन जाएगा तब जी लूँगा।। कोई कहता है जब बच्चे थोड़े बड़े हो जाएँ तब जी लूँगा।। कोई कहता है जब काम-धंधे से निवृत्त हो जाऊँगा, तब शांति से जी लूँगा।। और कोई यह सोचता है कि बस ये दो-तीन जरूरी काम निपटा लूँ, फिर आराम से जीना शुरू करूँगा।।यही सोच पूरी उम्र चलती रहती है।।हर दिन एक वादा करता है कि आज नहीं, कल।। हर सुबह एक आश्वासन देती है कि अभी नहीं, थोड़ा बाद में।। और इस थोड़ा बाद में के चक्कर में जीवन हाथ से निकलता चला जाता है।। मनुष्य थक जाता है, उम्र बीत जाती है, पर जीने की बारी नहीं आती।।सबसे बड़ा धोखा कल है।।

कल कभी आता ही नहीं।। किसी का कल कभी नहीं आया  जिसे आया वह भी आज बनकर ही आया।। कल सिर्फ एक कल्पना है एक टालने का तरीका है।। यह मन को सांत्वना देता है कि अभी नहीं, बाद में परंतु जीवन बाद में नहीं होता क्योंकि जीवन हमेशा अभी होता है।।और इसी बीच एक दिन मृत्यु आ खड़ी होती है।। बिना सूचना, बिना अनुमति और तब सारी तैयारियाँ अधूरी रह जाती हैं।। पैसे की योजना अधूरी,शांति का सपना अधूरा,जीने की इच्छा अधूरी।। आदमी समझता है कि वह बहुत समझदारी से जी रहा था, जबकि सच यह होता है कि उसने जीवन को टालते-टालते खो दिया।।यह कोई डराने की बात नहीं है यह सिर्फ देखने की बात है।।

जीवन कोई मंज़िल नहीं है जिसे पहुँचकर जिया जाए।।जीवन तो रास्ता हैऔर रास्ते में ही जिया जाता है।। जो यह सोचता है कि पहले सब ठीक कर लूँ, फिर जीऊँगा वह कभी नहीं जी पाता।। क्योंकि सब ठीक कभी नहीं होता।। हमेशा कुछ न कुछ बाकी रहता है।।

जीना काम छोड़ देने का नाम नहीं है न ही जीना जिम्मेदारियों से भागने का नाम  है।। जीना यही है कि काम करते हुए भी भीतर आनंद बना रहे।। हाथ काम में हों, पर मन टला हुआ न हो।। भविष्य की चिंता हो पर इसके लिए वर्तमान कुचला न जाए।।जो व्यक्ति यह जान लेता है कि जीवन बाद में नहीं अपितु अभी है वही सच में जीता है।। वह काम भी करता है योजना भी बनाता है  पर जीने को रोकता नहीं।। वह हँसता है महसूस करता है और  साधारण बातों में भी रस ढूँढ लेता है।।
आज ही जीना कोई दर्शन नहीं है, यह व्यावहारिक सच्चाई है क्योंकि आज के अलावा कुछ है ही नहीं।। बीता हुआ हाथ में नहीं है और आने वाला भरोसे में नहीं है।। जो है वह यही क्षण है यही पल है।।

इसलिए आज ही जिएँ काम करते जाएँ और आनंद लेते जाएँ।। यह न सोचें कि कब जीएँगे अपितु यह देखें कि अभी कैसे जी रहे हैं क्योंकि जीवन तैयारी नहीं माँगता, उपस्थिति माँगता है और जो उपस्थित होकर जी लेता है उसे कभी यह अफ़सोस नहीं होता कि वह जी नहीं पाया।।

जितना जान पाया बोल दिया शेष सांसारिक मनुष्य अल्पज्ञ ही होता है अतः मैं भी अल्पज्ञ ही हूं।।
सर्वज्ञ केवल श्रीभगवान ही हैं।।
सब उन्हीं की इच्छा से है ये लेख भी उन्हीं की इच्छा है और आपका अध्ययन भी उन्हीं की इच्छा है।।
सबके अंदर विराजमान भगवान शिव को सादर प्रणाम करता हूं।।

Tuesday, 6 January 2026

ज्योतिषीय भाव और मानव चेतना का भूगोल

"ज्योतिषीय भाव और मानव चेतना का भूगोल
पिण्ड–ब्रह्माण्ड–काल–देश के समन्वय का शास्त्रीय अध्ययन" 

✓•भूमिका: भारतीय ज्योतिष को यदि केवल भविष्यकथन की पद्धति माना जाए, तो यह उसकी अत्यन्त सीमित व्याख्या होगी। वास्तव में ज्योतिष एक चेतना–विज्ञान (Science of Consciousness) है, जिसमें मानव पिण्ड, पृथ्वी का भूगोल, आकाशीय ग्रह-गति और काल—ये चारों एक समन्वित तन्त्र के रूप में कार्य करते हैं।

इस शोधप्रबंध का मूल प्रतिपाद्य यह है कि ज्योतिषीय भाव केवल बाह्य घटनाओं के सूचक नहीं, बल्कि मानव चेतना के भूगोल (Geography of Consciousness) हैं। जैसे पृथ्वी पर उत्तर–दक्षिण, पूर्व–पश्चिम का भेद है, वैसे ही मानव चेतना में भी ऊर्ध्व–अधो, बहिर्मुख–अन्तर्मुख, स्थूल–सूक्ष्म स्तरों का विभाजन है—और यही विभाजन बारह भावों में दार्शनिक रूप से अभिव्यक्त होता है।

✓•१. “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” : मूल सिद्धान्त

∆भारतीय परम्परा का केन्द्रीय सूत्र है—

"यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे ।" 

•अर्थात् जो संरचना ब्रह्माण्ड में है, वही संरचना मानव देह और चेतना में भी विद्यमान है।

∆ज्योतिषीय भाव इसी सूत्र का व्यावहारिक रूप हैं—
•आकाश में ग्रह
•पृथ्वी पर जातक
•चेतना में अनुभव
इन तीनों को एक ही गणितीय–दार्शनिक ढाँचे में बाँधते हैं।

✓•२. भाव क्या हैं? : केवल घटनाएँ नहीं, चेतना–क्षेत्र

∆शास्त्रीय दृष्टि से—

"भावा नाम चेतनाविशेषाः।" 

∆भाव केवल “घर, धन, विवाह” जैसे स्थूल विषय नहीं हैं, बल्कि—
•अनुभूति के क्षेत्र
•चेतना के स्तर
•जीवन–ऊर्जा के प्रवाह
के सूचक हैं।

"लग्नादारभ्य भावाः स्युः जीवचैतन्यविभागकाः।" 

•अर्थ—लग्न से आरम्भ होकर भाव, जीव की चेतना के विभिन्न विभागों को प्रकट करते हैं।

✓•३. लग्न और चेतना का केन्द्र (Self-Awareness):

✓•३.१ लग्न : चेतना का उद्गम बिन्दु

∆लग्न वह बिन्दु है जहाँ—
•आकाश
•पृथ्वी
•जातक
तीनों मिलते हैं।

"लग्नं नाम देहचैतन्यस्य द्वारम् ।" 

•यह मैं हूँ की अनुभूति का केन्द्र है।

✓•३.२ भूगोल और लग्न:
∆अक्षांश बदलने से—
•क्षितिज बदलता है
•लग्न बदलता है
अर्थात् भूगोल बदलने से चेतना की अभिव्यक्ति बदल जाती है।

✓•४. भावों का ऊर्ध्व–अधो चेतना–मानचित्र:
भारतीय ज्योतिष में भावों को केवल क्षैतिज नहीं, बल्कि ऊर्ध्व चेतना–क्रम में भी समझा गया है।

भाव                    चेतना–स्तर
प्रथम                  आत्म–बोध
द्वितीय                 अस्तित्व–सुरक्षा
तृतीय।                 इच्छा–प्रयत्न
चतुर्थ                   भावनात्मक मूल
पंचम                   बुद्धि–सृजन
षष्ठ संघर्ष–           अनुशासन
सप्तम                  प्रतिबिम्बित चेतना
अष्टम।                 रूपान्तरण
नवम                   दर्शन–बोध
दशम                   कर्म–प्रकाश
एकादश               विस्तार
द्वादश                  लय

•यह क्रम दर्शाता है कि भाव चेतना की सीढ़ियाँ हैं।

✓•५. पृथ्वी का भूगोल और चेतना का भूगोल:

✓•५.१ पूर्व–पश्चिम : बहिर्मुख और अन्तर्मु
•पूर्व क्षितिज (लग्न) → चेतना का उदय
•पश्चिम क्षितिज (सप्तम) → चेतना का प्रतिबिम्ब

"यथा सूर्य उदेति तथा अहंभावः जागर्ति ।" 

✓•५.२ उत्तर–दक्षिण : ऊर्ध्व और अधो चेतना
•उत्तर दिशा → ऊर्ध्वगामी चेतना (ज्ञान, धर्म)
•दक्षिण दिशा → अधोगामी चेतना (भोग, कर्म)

∆यही कारण है कि—
•नवम–दशम भाव “ऊर्ध्व चेतना” से
•द्वितीय–अष्टम भाव “अधो चेतना” से
सम्बद्ध माने जाते हैं।

✓•६. चक्र–तन्त्र और भाव–तन्त्र:

∆मानव शरीर में—
•मूलाधार से सहस्रार तक
•सात प्रमुख चक्र
माने गए हैं।
भाव–तन्त्र इन चक्रों का विस्तारित सामाजिक–मानसिक रूप है।

चक्र                         भाव–सम्बन्ध
मूलाधार                    द्वितीय–षष्ठ
स्वाधिष्ठान                  सप्तम–अष्टम
मणिपूर                      दशम
अनाहत।                    चतुर्थ
विशुद्ध।                      द्वितीय
आज्ञा                         पंचम–नवम
सहस्रार।                     द्वादश

"देहे चक्रं यथा, जीवने भावास्तथा ।" 

✓•७. अष्टम और द्वादश : चेतना का रहस्य–भूगोल

✓•७.१ अष्टम भाव : रूपान्तरण
∆अष्टम भाव—
•मृत्यु
•रहस्य
•कुंडलिनी–जागरण
का भाव है।

"अष्टमे चेतना भिद्यते ।" 

•यह वह बिन्दु है जहाँ स्थूल अहंकार टूटता है।

✓•७.२ द्वादश भाव : लय

∆द्वादश भाव—
•त्याग
•समाधि
•मोक्ष
का सूचक है।

"द्वादशे लयं याति जीवचेतना ।" 

✓•८. सामाजिक भूगोल और भाव:
∆भाव केवल व्यक्तिगत नहीं—
•पारिवारिक
•सामाजिक
•सामूहिक चेतना
के भी द्योतक हैं।

∆उदाहरण—
•चतुर्थ → राष्ट्र–भूमि
•दशम → शासन
•एकादश → समाज
•द्वादश → सभ्यतागत लय
इस प्रकार ज्योतिष मानव चेतना का सामाजिक भूगोल भी रचता है।

✓•९. ज्योतिषीय साधना : चेतना–उन्नयन का मानचित्र ज्योतिष का परम उद्देश्य केवल फलादेश नहीं, बल्कि—
•चेतना का परिष्कार।

∆भाव–ज्ञान से—
•व्यक्ति अपने चेतना–स्तर को पहचानता है
•ग्रहों को बाधा नहीं, संकेत मानता है
•कर्म को सुधार का साधन बनाता है

✓•१०. निष्कर्ष:
इस शोध से निम्न निष्कर्ष स्पष्ट रूप से स्थापित होते हैं—
•१. ज्योतिषीय भाव केवल घटनात्मक नहीं, चेतनात्मक संरचनाएँ हैं
•२. अक्षांश–देशांतर के माध्यम से पृथ्वी का भूगोल चेतना को आकार देता है
•३. भाव मानव जीवन का आन्तरिक मानचित्र हैं
•४. ज्योतिष, भूगोल और अध्यात्म—तीनों एक ही सत्य के विभिन्न आयाम हैं
अतः यह निष्कर्ष नितान्त शास्त्रीय एवं दार्शनिक है कि—

"ज्योतिषीय भाव, मानव चेतना का भूगोल हैं।" 

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Sunday, 4 January 2026

जैसा खाए अन्न, वैसा होय मन

दोस्तों! प्राचीन लोकोक्ति है- 'जैसा खाए अन्न, वैसा होय मन'। हमारे भोजन का सीधा प्रभाव हमारे चरित्र व मन पर पड़ता है। आईये इस संदर्भ में कहानी को सुनते हैं। एक बार एक ऋषि ने सोचा कि लोग गंगा में पाप धोने जाते है, तो इसका मतलब हुआ कि सारे पाप गंगा में समा गए और गंगा भी पापी हो गयी .

अब यह जानने के लिए तपस्या की, कि पाप कहाँ जाता है ? तपस्या करने के फलस्वरूप देवता प्रकट हुए , ऋषि ने पूछा कि भगवन जो पाप गंगा में धोया जाता है वह पाप कहाँ जाता है ?

भगवन ने कहा कि चलो गंगा से ही पूछते है ,

दोनों लोग गंगा के पास गए और कहा कि ,

हे गंगे ! जो लोग तुम्हारे यहाँ पाप धोते है तो इसका मतलब आप भी पापी हुई .

गंगा ने कहा मैं क्यों पापी हुई , मैं तो सारे पापों को ले जाकर समुद्र को अर्पित कर देती हूँ ,

अब वे लोग समुद्र के पास गए , हे सागर ! गंगा जो पाप आपको अर्पित कर देती है तो इसका मतलब आप भी पापी हुए . समुद्र ने कहा मैं क्यों पापी हुआ ,

मैं तो सारे पापों को लेकर भाप बना कर बादल बना देता हूँ । अब वे लोग बादल के पास गए।

हे बादलो ! समुद्र जो पापों को भाप बनाकर बादल बना देते है, तो इसका मतलब आप पापी हुए ।

बादलों ने कहा मैं क्यों पापी हुआ,

मैं तो सारे पापों को वापस पानी बरसा कर धरती पर भेज देता हूँ , जिससे अन्न उपजता है ,

जिसको मानव खाता है ।उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और

जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है । जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है ।

उसी अनुसार मानव की मानसिकता बनती है शायद इसीलिये कहते हैं ..” जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन ” 

अन्न को जिस वृत्ति ( कमाई ) से प्राप्त किया जाता है

और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है वैसे ही विचार मानव के बन जाते है।

इसीलिये सदैव भोजन शांत अवस्था में पूर्ण रूचि के साथ करना चाहिए, और कम से कम अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए।

इसके बारे में और जानने के लिए ये कथा सुने!

एक साधु ग्रामानुग्राम विचरण करते हुए जा रहे थे और

एक गांव में प्रवेश करते ही शाम हो गई। ग्राम सीमा पर स्थित पहले ही घर में आश्रय मांगा,

वहां एक पुरुष था जिसने रात्री विश्राम की अनुमति दे दी।

और भोजन के लिये भी कहा।

साधु भोजन कर बरामदे में पडी खाट पर सो गया। चौगान में गृहस्वामी का सुन्दर हृष्ट पुष्ट घोडा बंधा था।

साधु सोते हुए उसे निहारने लगा। साधु के मन में दुर्विचार नें डेरा जमाया,

‘यदि यह घोडा मेरा हो जाय तो मेरा ग्रामानुग्राम विचरण सरल हो जाय’।

वह सोचने लगा, जब गृहस्वामी सो जायेगा आधी रात को मैं घोडा लेकर चुपके से चल पडुंगा। गृहस्वामी को सोया जानकर साधु घोडा ले उडा।

कोई एक कोस जा कर पेड से घोडा बांधकर सो गया। प्रातः उठकर नित्यकर्म निपटाया और घोडे के पास आकर फ़िर उसके विचारों ने गति पकडी। ‘अरे! मैने यह क्या किया? एक साधु होकर मैने चोरी की? यह कुबुद्धि मुझे क्यों कर सुझी?’ उसने घोडा गृहस्वामी को वापस लौटाने का निश्चय किया और उल्टी दिशा में चल पडा।

उसी घर में पहूँच कर गृहस्वामी से क्षमा मांगी और घोडा लौटा दिया। साधु नें सोचा कल मैने इसके घर का अन्न खाया था, कहीं मेरी कुबुद्धि का कारण इस घर का अन्न तो नहीं, जिज्ञासा से उस गृहस्वामी को पूछा- ‘आप काम क्या करते है, आपकी आजिविका क्या है?’ अचकचाते हुए गृहस्वामी नें, साधु जानकर सच्चाई बता दी- ‘महात्मा मैं चोर हूँ,और चोरी करके अपना जीवन यापन करता हूँ’। साधु का समाधान हो गया, चोरी से उपार्जित अन्न का आहार पेट में जाते ही उस के मन में कुबुद्धि पैदा हो गई थी। जो प्रातः नित्यकर्म में उस अन्न के निहार हो जाने पर ही सद्बुद्धि वापस लौटी।

तो दोस्तों! आपने देखा किस तरह हमारे द्वारा ग्रहण किए गए अन्न का प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है।

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बौद्धिक क्षमता का विकास और धारणाओं का परिष्करण

विश्लेषण 
बौद्धिक क्षमता का विकास और धारणाओं का परिष्करण
सुनने में यह बहुत भारी और अच्छा लगता है, लेकिन अध्यात्म की यात्रा में यही सबसे बड़ी रुकावट साबित 
हुआ है।  क्यो,

बुद्धि का काम है चीजों को परिभाषित करना। 
लेबल लगाना।
हम 'ईश्वर' या 'शून्य' की इतनी सटीक परिभाषा बना लेते हैं कि शब्दों को ही अनुभव मान बैठते हैं।
यह वैसे ही है जैसे प्यास लगने पर 'पानी' शब्द को रटना। इससे प्यास नहीं बुझती, बस भ्रम गहरा हो जाता है कि हम कुछ जानते हैं।

 तर्क का स्वभाव है काटना। 'ये' अलग और 'वो' अलग।
अध्यात्म जुड़ना है। 
एक होना है।
जितनी तेज बुद्धि होगी, वह उतनी ही बारीकी से 'मैं' और 'अस्तित्व' के बीच दीवार खड़ी करेगी। एक बुद्धिमान आदमी के लिए झुकना सबसे मुश्किल है। उसका तर्क उसे मिटने
 नहीं देता है।

धारणाओं को परिष्कृत करना मतलब क्या है लोहे की जंजीर को सोने की जंजीर से बदल देना।
बुरे विचारों को अच्छे विचारों से बदल भी दिया, तो क्या हुआ?
बांधा तो विचार में ही है।
यहाँ 'आध्यात्मिक अहंकार' चुपके से बैठ जाता है। 
"मैं ज्ञानी हूँ", "मैं सात्विक हूँ"।
यह अहंकार सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह पवित्रता के कपड़े पहनकर बैठा है। इसे पकड़ना मुश्किल है।

बुद्धि हमेशा विश्लेषण करती है।
ध्यान में भी हम सोचते रहते हैं क्या हो रहा है, क्या यह सही है या गलत।
अध्यात्म नदी में कूदने जैसा है आप किनारे पर खड़े होकर पानी का तापमान नाप रहे हैं।
विश्लेषण आपको कभी अनुभव में डूबने नहीं देगा।
 वह आपको हमेशा सतह पर रखेगा।

मै कहता हूं आखिर में 
बुद्धि का काम सिर्फ दरवाजे तक पहुचाना है।
मंदिर के अंदर जाने से पेहेले चप्पल  और दिमाग( बुद्धि), दोनों बाहर उतार देते है।
वहाँ सोचने का उपयोग ही 
नही है। 
वहाँ सिर्फ होना होता है।

तर्क का अंतिम उपयोग यही है कि वह अपनी ही व्यर्थता को समझ ले और शांत हो जाए।

Friday, 2 January 2026

मानवीय समाज

इस दुनिया में कई दुनिया हैं, और मैं ये बात किसी दर्शन की किताब से नहीं कह रहा, बल्कि अपने रोज़मर्रा के अनुभव से कह रहा हूँ। बाहर जो एक दुनिया दिखाई देती है सड़कों पर चलती भीड़, बोलते चेहरे, हँसी-ठहाके, काम-धंधे, रिश्ते, वो बस एक परत है। उसके भीतर हर इंसान अपनी एक अलग दुनिया लेकर चलता है, जिसे न कोई पूरा देख पाता है, न समझ पाता है। कई बार तो इंसान खुद भी उस दुनिया को शब्दों में नहीं ढाल पाता, बस ढोता रहता है। मैंने देखा है जो सबसे ज्यादा मुस्कुराता है, उसकी भीतर की दुनिया सबसे ज्यादा थकी हुई होती है। जो बहुत बोलता है उसकी भीतर की दुनिया में अक्सर एक गहरी चुप्पी जमा होती है। और जो चुप रहता है उसकी भीतर की दुनिया में सवालों, यादों और टूटे हुए संवादों का शोर चलता रहता है। बाहर से हम एक जैसे लग सकते हैं, पर भीतर सबका भूगोल अलग है, वहाँ के रास्ते, वहाँ की रातें, वहाँ की पीड़ाएँ अलग-अलग हैं। किसी की भीतर की दुनिया अधूरे सपनों से बनी है। वो हर सुबह उठता है, काम पर जाता है, जिम्मेदारियाँ निभाता है, पर भीतर कहीं एक सपना रोज़ मरता है और रोज़ ही जिंदा भी हो जाता है। किसी की दुनिया अपराधबोध से भरी है, किसी से कहा गया कठोर शब्द, किसी रिश्ते को समय न दे पाने की टीस, किसी फैसले का बोझ। कोई बाहर से बहुत सुलझा हुआ दिखता है, लेकिन भीतर की दुनिया में वो हर रात खुद से लड़ता है। कुछ लोग अपनी भीतर की दुनिया में अकेलेपन के साथ जीना सीख चुके हैं। उन्हें भीड़ नहीं चाहिए, शोर नहीं चाहिए, क्योंकि उनकी दुनिया पहले ही बहुत भारी है। वे जानते हैं कि हर नया रिश्ता, हर नया संवाद, भीतर की दुनिया में एक नया बोझ भी ला सकता है। इसलिए वे सीमित रहते हैं, संयमित रहते हैं, और लोग उन्हें ग़लत समझ लेते हैं अहंकारी, रूखे, या उदास। जबकि सच्चाई ये है कि वे बस अपनी दुनिया को बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं। मैंने ये भी देखा है कि कुछ लोगों की भीतर की दुनिया अतीत में अटकी होती है। वो वर्तमान में जीते हुए भी लगातार पीछे देखते रहते हैं। किसी पुराने प्रेम की याद, किसी खोए हुए इंसान की कमी, किसी बीते समय की सरलता। बाहर से वे आगे बढ़ चुके होते हैं, पर भीतर की दुनिया में समय ठहर गया होता है। वहाँ घड़ियाँ नहीं चलतीं, सिर्फ़ यादें चलती हैं। और कुछ लोगों की भीतर की दुनिया डर से बनी होती है। भविष्य का डर, असफल होने का डर, अकेले रह जाने का डर। वे हर निर्णय लेने से पहले सौ बार सोचते हैं, हर कदम डरते-डरते उठाते हैं। बाहर से उन्हें सावधान कहा जाता है, लेकिन भीतर की दुनिया में वो हर रोज़ खुद को समझाते रहते हैं कि सब ठीक हो जाएगा, चाहे यकीन खुद को भी न हो। सबसे अजीब बात तो ये है कि हम एक-दूसरे की भीतर की दुनिया जाने बिना ही फैसले सुना देते हैं। किसी के व्यवहार को देख कर उसका चरित्र तय कर लेते हैं। किसी की चुप्पी को घमंड समझ लेते हैं, किसी की हँसी को खुशी। हम भूल जाते हैं कि हर इंसान अपने भीतर एक पूरी दुनिया लेकर चल रहा है, और वो दुनिया शायद आज किसी भूकंप से गुजर रही हो। मैं खुद भी अपनी एक दुनिया लेकर चलता हूँ। बाहर से सामान्य, भीतर से सवालों से भरी। कुछ जवाब मिल चुके हैं, कुछ आज भी भटक रहे हैं। कुछ दिन भीतर की दुनिया शांत रहती है, कुछ दिन वहाँ तूफ़ान चलता है। मैंने सीख लिया है कि हर किसी को अपनी भीतर की दुनिया सँभालने का हक़ है, और हर दुनिया को थोड़ा सा सम्मान चाहिए, भले हम उसे समझ न पाएं.....!!!!!!

मानवीय जीवन और आकांक्षा

कितना भी कर लीजिए, कहीं न कहीं कुछ न कुछ अधूरा रह ही जाता है। मन की पूरी निष्ठा, समय की पूरी ईमानदारी और श्रम की पूरी क्षमता लगा देने के बाद भी जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कोई एक कोना खाली दिख ही जाता है। ये खालीपन कभी हमारे भीतर की अपेक्षाओं से जन्म लेता है, तो कभी दूसरों की निगाहों से। और अक्सर वही खाली कोना सबसे पहले दिखाया भी जाता है। लोग पूरे प्रयास को नहीं देखते, वे उस छोटी-सी दरार को देखते हैं जहाँ से सवाल उठाया जा सके। ये स्वभाव शायद मनुष्य का ही है, पूरे दीपक की रौशनी छोड़कर उसके नीचे की छाया गिन लेना। आप जितना शांत भाव से अपने कर्तव्य निभाते हैं, उतनी ही आसानी से आपकी कमियाँ गिना दी जाती हैं, मानों वही आपकी पूरी पहचान हों। उस क्षण भीतर कुछ टूटता है, क्योंकि आपने जो दिया था, वो अनदेखा रह गया और जो नहीं दे पाए, वही आपका परिचय बन गया। कमियाँ जब गिनाई जाती हैं, तो वे केवल शब्द नहीं होतीं। वे सीधे आत्मसम्मान से टकराती हैं। सुनते हुए मन खुद से सवाल करता है क्या सच में मेरा प्रयास इतना कम था? क्या मेरी नीयत में कोई खोट रह गई? और यहीं से अफसोस जन्म लेता है। अफसोस इस बात का नहीं कि गलती हुई, बल्कि इस बात का कि पूरी ईमानदारी के बावजूद केवल गलती ही देखी गई।सबसे अधिक चोट तो तब लगती है जब कमियाँ उन लोगों की ओर से आती हैं, जिनके लिए आपने स्वयं को पीछे रखा था। जिनकी सुविधा के लिए आपने अपने समय, अपनी इच्छा और अपने सुख को टाल दिया था। तब मन में ये स्वीकार करना कठिन हो जाता है कि निस्वार्थता भी हमेशा सम्मान नहीं पाती। कई बार तो ऐसा लगता है कि जितना अधिक आप देते हैं, उतनी ही अपेक्षाएँ बढ़ती जाती हैं, और अपेक्षाओं के साथ बढ़ती जाती हैं शिकायतें। यकीन मानिए ये भी एक कड़वा सत्य है कि संसार पूर्णता को नहीं, सुविधा को सराहता है। जब तक आपकी मौजूदगी किसी के लिए सहूलियत बनी रहती है, आप अच्छे हैं। जिस दिन आप अपेक्षा से एक कदम पीछे रह गए, उसी दिन आपकी सारी अच्छाइयाँ भुला दी जाती हैं। तब आपके वर्षों के प्रयास एक पल में हल्के पड़ जाते हैं। इन क्षणों में सबसे कठिन काम होता है स्वयं को संभालना। मन बार-बार कहता है कि शायद और कर लेना चाहिए था, शायद और सह लेना चाहिए था। लेकिन धीरे-धीरे ये समझ भी उभरती है कि इंसान होना ही अपूर्ण होना है। हर सीमा को लांघ पाना, हर अपेक्षा को पूरा कर पाना, ये किसी के लिए संभव नहीं। कमी रह जाना असफलता नहीं, मानवीय होना है.....!!!!!!