मानवीय प्रवृत्ति
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इस दुनिया में कई दुनिया हैं, और मैं ये बात किसी दर्शन की किताब से नहीं कह रहा, बल्कि अपने रोज़मर्रा के अनुभव से कह रहा हूँ। बाहर जो एक दुनिया दिखाई देती है सड़कों पर चलती भीड़, बोलते चेहरे, हँसी-ठहाके, काम-धंधे, रिश्ते, वो बस एक परत है। उसके भीतर हर इंसान अपनी एक अलग दुनिया लेकर चलता है, जिसे न कोई पूरा देख पाता है, न समझ पाता है। कई बार तो इंसान खुद भी उस दुनिया को शब्दों में नहीं ढाल पाता, बस ढोता रहता है। मैंने देखा है जो सबसे ज्यादा मुस्कुराता है, उसकी भीतर की दुनिया सबसे ज्यादा थकी हुई होती है। जो बहुत बोलता है उसकी भीतर की दुनिया में अक्सर एक गहरी चुप्पी जमा होती है। और जो चुप रहता है उसकी भीतर की दुनिया में सवालों, यादों और टूटे हुए संवादों का शोर चलता रहता है। बाहर से हम एक जैसे लग सकते हैं, पर भीतर सबका भूगोल अलग है, वहाँ के रास्ते, वहाँ की रातें, वहाँ की पीड़ाएँ अलग-अलग हैं। किसी की भीतर की दुनिया अधूरे सपनों से बनी है। वो हर सुबह उठता है, काम पर जाता है, जिम्मेदारियाँ निभाता है, पर भीतर कहीं एक सपना रोज़ मरता है और रोज़ ही जिंदा भी हो जाता है। किसी की दुनिया अपराधबोध से भरी है, किसी से कहा गया कठोर शब्द, किसी रिश्ते को समय न दे पाने की टीस, किसी फैसले का बोझ। कोई बाहर से बहुत सुलझा हुआ दिखता है, लेकिन भीतर की दुनिया में वो हर रात खुद से लड़ता है। कुछ लोग अपनी भीतर की दुनिया में अकेलेपन के साथ जीना सीख चुके हैं। उन्हें भीड़ नहीं चाहिए, शोर नहीं चाहिए, क्योंकि उनकी दुनिया पहले ही बहुत भारी है। वे जानते हैं कि हर नया रिश्ता, हर नया संवाद, भीतर की दुनिया में एक नया बोझ भी ला सकता है। इसलिए वे सीमित रहते हैं, संयमित रहते हैं, और लोग उन्हें ग़लत समझ लेते हैं अहंकारी, रूखे, या उदास। जबकि सच्चाई ये है कि वे बस अपनी दुनिया को बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं। मैंने ये भी देखा है कि कुछ लोगों की भीतर की दुनिया अतीत में अटकी होती है। वो वर्तमान में जीते हुए भी लगातार पीछे देखते रहते हैं। किसी पुराने प्रेम की याद, किसी खोए हुए इंसान की कमी, किसी बीते समय की सरलता। बाहर से वे आगे बढ़ चुके होते हैं, पर भीतर की दुनिया में समय ठहर गया होता है। वहाँ घड़ियाँ नहीं चलतीं, सिर्फ़ यादें चलती हैं। और कुछ लोगों की भीतर की दुनिया डर से बनी होती है। भविष्य का डर, असफल होने का डर, अकेले रह जाने का डर। वे हर निर्णय लेने से पहले सौ बार सोचते हैं, हर कदम डरते-डरते उठाते हैं। बाहर से उन्हें सावधान कहा जाता है, लेकिन भीतर की दुनिया में वो हर रोज़ खुद को समझाते रहते हैं कि सब ठीक हो जाएगा, चाहे यकीन खुद को भी न हो। सबसे अजीब बात तो ये है कि हम एक-दूसरे की भीतर की दुनिया जाने बिना ही फैसले सुना देते हैं। किसी के व्यवहार को देख कर उसका चरित्र तय कर लेते हैं। किसी की चुप्पी को घमंड समझ लेते हैं, किसी की हँसी को खुशी। हम भूल जाते हैं कि हर इंसान अपने भीतर एक पूरी दुनिया लेकर चल रहा है, और वो दुनिया शायद आज किसी भूकंप से गुजर रही हो। मैं खुद भी अपनी एक दुनिया लेकर चलता हूँ। बाहर से सामान्य, भीतर से सवालों से भरी। कुछ जवाब मिल चुके हैं, कुछ आज भी भटक रहे हैं। कुछ दिन भीतर की दुनिया शांत रहती है, कुछ दिन वहाँ तूफ़ान चलता है। मैंने सीख लिया है कि हर किसी को अपनी भीतर की दुनिया सँभालने का हक़ है, और हर दुनिया को थोड़ा सा सम्मान चाहिए, भले हम उसे समझ न पाएं.....!!!!!!
कितना भी कर लीजिए, कहीं न कहीं कुछ न कुछ अधूरा रह ही जाता है। मन की पूरी निष्ठा, समय की पूरी ईमानदारी और श्रम की पूरी क्षमता लगा देने के बाद भी जब पीछे मुड़कर देखते हैं, तो कोई एक कोना खाली दिख ही जाता है। ये खालीपन कभी हमारे भीतर की अपेक्षाओं से जन्म लेता है, तो कभी दूसरों की निगाहों से। और अक्सर वही खाली कोना सबसे पहले दिखाया भी जाता है। लोग पूरे प्रयास को नहीं देखते, वे उस छोटी-सी दरार को देखते हैं जहाँ से सवाल उठाया जा सके। ये स्वभाव शायद मनुष्य का ही है, पूरे दीपक की रौशनी छोड़कर उसके नीचे की छाया गिन लेना। आप जितना शांत भाव से अपने कर्तव्य निभाते हैं, उतनी ही आसानी से आपकी कमियाँ गिना दी जाती हैं, मानों वही आपकी पूरी पहचान हों। उस क्षण भीतर कुछ टूटता है, क्योंकि आपने जो दिया था, वो अनदेखा रह गया और जो नहीं दे पाए, वही आपका परिचय बन गया। कमियाँ जब गिनाई जाती हैं, तो वे केवल शब्द नहीं होतीं। वे सीधे आत्मसम्मान से टकराती हैं। सुनते हुए मन खुद से सवाल करता है क्या सच में मेरा प्रयास इतना कम था? क्या मेरी नीयत में कोई खोट रह गई? और यहीं से अफसोस जन्म लेता है। अफसोस इस बात का नहीं कि गलती हुई, बल्कि इस बात का कि पूरी ईमानदारी के बावजूद केवल गलती ही देखी गई।सबसे अधिक चोट तो तब लगती है जब कमियाँ उन लोगों की ओर से आती हैं, जिनके लिए आपने स्वयं को पीछे रखा था। जिनकी सुविधा के लिए आपने अपने समय, अपनी इच्छा और अपने सुख को टाल दिया था। तब मन में ये स्वीकार करना कठिन हो जाता है कि निस्वार्थता भी हमेशा सम्मान नहीं पाती। कई बार तो ऐसा लगता है कि जितना अधिक आप देते हैं, उतनी ही अपेक्षाएँ बढ़ती जाती हैं, और अपेक्षाओं के साथ बढ़ती जाती हैं शिकायतें। यकीन मानिए ये भी एक कड़वा सत्य है कि संसार पूर्णता को नहीं, सुविधा को सराहता है। जब तक आपकी मौजूदगी किसी के लिए सहूलियत बनी रहती है, आप अच्छे हैं। जिस दिन आप अपेक्षा से एक कदम पीछे रह गए, उसी दिन आपकी सारी अच्छाइयाँ भुला दी जाती हैं। तब आपके वर्षों के प्रयास एक पल में हल्के पड़ जाते हैं। इन क्षणों में सबसे कठिन काम होता है स्वयं को संभालना। मन बार-बार कहता है कि शायद और कर लेना चाहिए था, शायद और सह लेना चाहिए था। लेकिन धीरे-धीरे ये समझ भी उभरती है कि इंसान होना ही अपूर्ण होना है। हर सीमा को लांघ पाना, हर अपेक्षा को पूरा कर पाना, ये किसी के लिए संभव नहीं। कमी रह जाना असफलता नहीं, मानवीय होना है.....!!!!!!